भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 404 में से

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पृष्ठ 108

( ९० ) माधवनिदान । यत्तं तु जीवितम् । तस्माद्यत्नेन संरक्षेद्यक्ष्मिणो मलरेतसी ॥" इति । और जिसके अंडकोश और उदर ये सूज गये हों ऐसा रोगी असाध्य है क्योंकि शोथवाला दस्तके करानेसे अच्छा होता है सो इसपर दस्त कराना वर्जित है । इसीसे ऐसे रोगीको वैद्य त्याग दे ॥ कौनसे रोगीको औषध देना योग्य है ? सो कहते हैं— ज्वरानुबन्धरहितं बलवन्तं क्रियासहम् । उपक्रमेदात्मवन्तं दीप्ताग्निमकृशं नरम् ॥ १२ ॥ जिस क्षय रोगवाले मनुष्यको ज्वरका सम्बन्ध होय नहीं, बलवान्, औषधादि उपचारका सहनेवाला और जिसकी इन्द्रियें बलमें हों तथा जठराग्नि जिसकी दीप्त होय और कृश न हो ऐसे रोगीकी चिकित्सा ( उपचार ) करना चाहिये । इस श्लोकमें "अकृशं" इस पदके धरनेका यह प्रयोजन है कि पुष्टदेहवाला भी क्षय रोगसे हजार दिन बच सके है सोई ग्रन्थान्तरमें लिखो है ॥ असाध्य लक्षण । शुक्लाक्षमन्नद्वेष्टारमूर्ध्वश्वासनिपीडितम् । कृच्छ्रेण बहु मेहन्तं यक्ष्मा हन्तीह मानवम् ॥ १३ ॥ सफेद नेत्र जिसके होगये हों, अन्न जिसको बुरा लगे, ऊर्ध्वश्वाससे पीडित और कष्टसे बहुत मूतनेवाला अर्थात् मल सुखसे उतरे इससे यह दिखाया कि जो आहार खाय सो मल होजाय, जब आहारका मल होगया तब उसके मांस रुधिर इनका क्षय होता है इसीसे यह असाध्य है, शुक्लाक्षादिक ये प्रत्येक अलग २ भी असाध्य हैं ॥ अब कहते हैं, कि अति मैथुनादि करनेसे धातुका क्षय होता है इसीसे क्षयरोग प्रगट होता है ऐसा नहीं किन्तु और भी कारणसे होता है उसको कहते हैं— व्यवायशोकवार्द्धक्यव्यायामाध्वप्रशोषिणः । व्रणोरःक्षतसंज्ञौ च शोषिणौ लक्षणं शृणु ॥ १४ ॥ अति मैथुनसे शोषी, शोक शोषी, वार्द्धक्यशोषी, व्यायामशोषी, मार्गशोषी, व्रण- शोषी और उरःक्षतशोषी इनके न्यारे न्यारे लक्षण कहता हूँ ॥ व्यवायशोषीके लक्षण । व्यवायशोषी शुक्रस्य क्षयलिङ्गैरुपद्रुतः । पाण्डुदेहो यथापूर्वं क्षीयन्ते चास्य धातवः ॥ १५ ॥ १ परं दिनसहस्रं तु यदि जीवति मानवः । सुभिषग्भिरुपक्रान्तस्तरुणः शोषपीडितः ॥ इति ॥