भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

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( ९२ ) माधवनिदान । शोषीके लक्षण कहने चाहिये फिर माधवाचार्यने अध्वशोषीके लक्षण क्यों कहे ? उत्तर-अध्वशोषीके लक्षण इस वास्ते कहे कि व्यायामशोषीके इसके सब लक्षण मिलते हैं । शंका-अच्छा आप ऐसे कहोगे तो व्यायामशोषीमें अध्वशोषीके कौनसे लक्षण नहीं मिलते ? उत्तर-तुमने कहा सो ठीक है परन्तु अध्वशोषीमें उरःक्षत आदि चिह्न नहीं हैं इससे पूर्व अध्वशोषीके लक्षण कहे ॥ व्यायामशोषीके लक्षण । व्यायामशोषी भूयिष्ठमेभिरेव समन्वितः । लिङ्गैरुरःक्षतकृतैः संयुक्तश्च क्षतं विना ॥ १९ ॥ व्यायामशोषी ( अत्यन्त दंडकसरत आदि श्रमसे क्षीण ) मनुष्य विशेष करके अध्वशोषीके लक्षण स्रस्तांगतादियुक्त होता है अर्थात् जो लक्षण अध्वशोषीमें थोडे थोडे होते हैं वे व्यायामशोषीमें अधिक होते हैं और उस मनुष्यके घावके बिनाही उरःक्षतके लक्षण मिलते हैं । उरःक्षतके लक्षण सुश्रुतमें लिखे हैं ॥ तीन कारणोंसे व्रणशोष होय, सो कहते हैं-- रक्तक्षयाद्वेदनाभिस्तथैवाहारयन्त्रणात् । व्रणिनश्च भवेच्छोषः स चासाध्यतमो मतः ॥ २० ॥ रुधिरके क्षयसे, फोडाकी पीडासे तैसे ही आहारके घटनेसे व्रणी पुरुषके जो शोष होय सो अत्यन्त असाध्य जानना ॥ उरःक्षतसे धातुशोष होनेका सम्भव है अतएव शोषप्रकरणमें निदानसहित उरःक्षतरोग कहते हैं-- धनुषाऽऽयस्यतोऽत्यर्थं भारमुद्वहतो गुरुम् । युध्यमानस्य बलिभिः पततो विषमोच्चतः ॥ २१ ॥ वृषं हयं वा धावन्तं दम्यं चान्यं निगृह्णतः । शिलाकाष्ठाश्मनिर्घातान् क्षिपतो निघ्नतः परान् ॥ २२ ॥ अधीयानस्य वाऽप्युच्चैर्दूरं वा व्रजतो द्रुतम् । महानदीर्वा तरतो हयैर्वा सह धावतः ॥ २३ ॥ सह- सोत्पततो दूरात्तूण वातिप्रनृत्यतः । तथाऽन्यैः कर्मभिः १ "तस्योरसि क्षते रक्तं भूयः श्लेष्मा च गच्छति । कासमानश्छर्दयेच्च पीतरक्तासितारुणम्॥ सन्तप्तवक्षसोऽत्यर्थं दमनात्परिताम्यति । दुर्गन्धोच्छ्वासवदनो भिन्नवर्णस्वरो नरः ॥ " इति