भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

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( ११६ ) माधवनिदान । मूर्च्छाका पूर्वरूप । हृत्पीडा जृम्भणं ग्लानिः संज्ञादौर्बल्यमेव च । सर्वासां पूर्वरूपाणि यथास्वं च विभावयेत् ॥ ६ ॥ हृदयमें पीडा, जम्भाई, ग्लानि, भ्रांति ये मूर्च्छाके पूर्वरूप हैं। आगे उस मूर्च्छाके वातादि भेद जानने यह भेद प्रगट हुई रूपावस्थामें जानने चाहिये, पूर्वरूपकी अव- स्थामें नहीं जानने चाहिये यह जैज्जटाचार्यका मत है ॥ वातकी मूर्च्छाके लक्षण । नीलं वा यदि वा कृष्णमाकाशमथवाऽरुणम् । पश्यंस्तमः प्रविशति शीघ्रं च प्रतिबुद्ध्यते ॥ ७ ॥ वेपथुश्चाङ्गमर्दश्च प्रपीडा हृदयस्य च । कार्श्यं श्यावारुणा च्छाया मूर्च्छार्ये वातसंभवे ॥ ८ ॥ जो मनुष्य नीले रंगका अथवा काले रंगका तथा लाल रंगका आकाशको देखे पीछे मूर्च्छाको प्राप्त होय और जल्दी होश हो जाय, देहमें कम्प, अंगोंका टूटना, हृदयमें पीडा होय, शरीर कृश हो जाय, शरीरका रंग काला, लाल पडजाय, उसको वातकी मूर्च्छा जाननी ॥ पित्तकी मूर्च्छाके लक्षण । रक्तं हरितवर्णं वा वियत्पीतमथापि वा । पश्यंस्तमः प्रविशति सस्वेदश्च प्रबुद्ध्यते ॥ ९ ॥ सपिपासः ससन्तापो रक्तपीताकुलेक्षणः । संभिन्नवर्चाः पीताभो मूर्च्छा चेत्पित्तसंभवा ॥ १० ॥ जिसको आकाश लाल, हरा, पीला दीखे पीछे मूर्च्छा आवै और सावधान होते समय पसीना आवे, प्यास होय, सन्ताप होय, नेत्र लाल पीले होयँ, मल पतला होय, देहका वर्ण पीला होय यह लक्षण पित्तकी मूर्च्छाके हैं ॥ कफकी मूर्च्छाके लक्षण । मेघसंकाशमाकाशमावृतं वा तमो घनैः । पश्यंस्तमः प्रविशति चिराच्च प्रतिबुद्ध्यते ॥ ११ ॥ गुरुभिः प्रावृतैरङ्गैर्यथैवार्द्रेण चर्मणा । सप्रसेकः सहृल्लासो मूर्च्छाये कफसंभवे ॥ १२ ॥ १ मूर्च्छायशब्दो मूर्च्छापर्यायः । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA