भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेत । ( ११९ ) मूर्च्छामें पित्त और तमोगुण अधिक रहे । रजोगुण पित्त और वायु इनसे भ्रम होय है । तमोगुण, वायु और कफ इनसे तन्द्रा और कफ तथा तमोगुण इनसे निद्रा उत्पन्न होती है ॥ तन्द्राके लक्षण । इन्द्रियार्थेष्वसंप्राप्तिर्गौरवं जृम्भणं क्लमः । निद्रार्त्तस्येव यस्यैते तस्य तन्द्रां विनिर्दिशेत् ॥ २० ॥ इन्द्रियें अपने अपने विषयको ग्रहण न करें, देह भारी हो जाय अर्थात् सुस्त हो जाय, जम्भाई और क्लम होय ये लक्षण निद्रार्त्त पुरुषके सदृश जिसके होयं उसको तन्द्रा कहते हैं । इसमें आधे नेत्र खुले रहते हैं । निद्रामें इन्द्रिय और मनको मोह होय है, तन्द्रामें केवल इंद्रियोंको ही मोह होता है । निद्रा और भ्रम ये दोनों अति- प्रसिद्ध होनेसे माधवाचार्यने नहीं कहे, परन्तु चरकमें कहे हैं सो इस प्रकारकी- जिस समय मन और इन्द्रिय खेदको प्राप्त होयं और अपने अपने विषय ( शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ) को त्याग देयं, तब यह मनुष्यको निद्रा आती है ॥ संन्यासके भेदको कहते हैं- दोषेषु मदमूर्च्छाद्या गतवेगेषु देहिनाम् । स्वयमेवोपशाम्यन्ति संन्यासो नौषधैर्विना ॥ २१ ॥ दोषोंके वेग होनेसे मदमूर्च्छादि अपने आप शान्त हो जाते हैं परन्तु यह संन्यास औषधके बिना शान्त नहीं होता है ॥ संन्यासके लक्षण । वाग्देहमनसां चेष्टा आक्षिप्यातिबला मलाः । संन्यस्यन्त्यबलं जन्तुं प्राणायतनमाश्रिताः ॥ २२ ॥ स ना संन्याससंन्यस्तः काष्ठीभूतो मृतोपमः । प्राणैर्विमुच्यते शीघ्रं मुक्त्वा सद्यःफलां क्रियाम् ॥ २३ ॥ अत्यन्त बलिष्ठ भये जो दोष सो वाणी देह और मन इनके व्यापारको बन्दकर हृदयमें प्राप्त हो निर्बलमनुष्यको मूर्च्छा करे वह संन्याससे पीडित मनुष्य काष्ठकी भांति पृथ्वीपर गिरे, उसकी सद्यःफल चिकित्सा अर्थात् सुईसे छेदना, तीखा १ यदा तु मनसि क्लान्ते कर्मात्मानः क्लमान्विताः । विषयेभ्योनिर्वर्त्तन्ते तदा स्वपिति मानवः॥ २ चक्रवद्‌भ्रमतो गात्रं भूमौ पतति सर्वदा । भ्रमरोग इति ज्ञेयो रजःपित्तानिलात्मकः ॥