भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेत । ( १४९ ) करोति विवृतास्यत्वमथवा संवृतास्यताम् । हनुग्रहः स तेन स्यात्कृच्छ्राच्चर्वणभाषणम् ॥ ५० ॥ जिह्वाके अतिघर्षण करनेसे, चना आदि सूखी वस्तुके खानेसे अथवा किसी प्रकार चोटके लगनेसे हनुमूल ( कपोल ) के अर्थात् डाढकी जड़में रहनेवाली जो वायु सो कुपित होकर हनुमूलको नीचे कर मुखको खुला ही रखदे अथवा मुखको बन्द करदे, उसको हनुग्रहरोग कहते हैं । तब उस मनुष्यका खाना बोलना कठिनतासे होय ॥ मन्यास्तम्भके लक्षण । दिवास्वप्नासमस्थानविकृतोर्ध्वनिरीक्षणैः । मन्यास्तम्भं प्रकुरुते स एव श्लेष्मणा युतः ॥ ५१ ॥ दिनमें सोनेसे, नीचे ऊंचे स्थानमें सोनेसे, ऊंचेको विकृतिपूर्वक देखनेसे इन कारणोंसे कोपको प्राप्त भई जो वात सो कफयुक्त होकर मन्या ( नाड़ी ) स्तंभन करे, इस रोगको मन्यास्तंभरोग कहते हैं ॥ जिह्वास्तम्भके लक्षण । वाग्वाहिनीशिरासंस्थो जिह्वां स्तम्भयतेऽनिलः । जिह्वास्तम्भः स तेनान्नपानवाक्येष्वनीशता ॥ ५२ ॥ वायु वाणीके बहनेवाली नाडियोंमें प्राप्त हो जिह्वाका स्तंभन करदे, उसको जिह्वा स्तंभ कहते हैं। यह अन्नपानकी तथा बोलनेकी सामर्थ्यका नाश करती है ॥ शिराग्रहके लक्षण । रक्तमाश्रित्य पवनः कुर्यान्मूर्धधराः शिराः । रूक्षाः सवेदनाः कृष्णाः सोऽसाध्यः स्याच्छिराग्रहः ॥ ५३ ॥ वायु रुधिरका आश्रयकर मस्तकके धारण करनेवाली नाडीको रूखी पीडायुक्त और काली करदे, यह शिराग्रहरोग असाध्य है ॥ गृध्रसीके लक्षण । स्फिक्पूर्वा कटिपृष्ठोरुजानुजङ्घापदं क्रमात् । गृध्रसी स्तंभरुक्तोदैर्गृह्णाति स्पन्दते मुहुः ॥ ५४ ॥ वाताद्वातकफात्तन्द्रागौरवारोचकान्विता ॥ ५५ ॥ १ मन्या-गलेकी नाड़ीको कहते हैं। २ 'शिरोग्रहः' ऐसा भी पाठ है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA