भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेत । ( १५१ ) प्रत्यष्ठीलाके लक्षण । एतामेव रुजायुक्तां वातविण्मूत्ररोधिनीम् । प्रत्यष्ठीलामिति वदेज्जठरे तिर्यगुत्थिताम् ॥ ६९ ॥ वाताष्ठीला ही अत्यन्त पीडायुक्त वात मूत्र मलके रोध करनेवाली और जो उद- रमें तिरछी प्रगट भई होय उसको प्रत्यष्ठीला कहते हैं ॥ मूत्रावरोधके लक्षण । मारुते विगुणे बस्तौ मूत्रं सम्यक्प्रवर्तते । विकारा विविधाश्चापि प्रतिलोमे भवन्ति हि ॥ ७० ॥ बस्ती (मूत्रस्थान) में वायु अनुलोमगतिसे गमन करे तो मूत्र अच्छी रीतिसें उतरे ऐसे प्रतिलोमसे गमन करे तो अनेक प्रकारके पथरी मूत्रकृच्छ्रादि विकार उत्पन्न होयं ॥ कंपवायुके लक्षण । सर्वाङ्गकम्पः शिरसो वायुर्वेपथुसंज्ञकः ॥ ७१ ॥ सब अंगोंको और मस्तकको जो कम्पावे उस वायुको वेपथु (कम्प) वायु कहते हैं ॥ खल्लीके लक्षण । खल्ली तु पादजङ्घोरुकरमूलावमोटिनी । और जो वायु पैर, जंघा, ऊरु और हाथके मूलमें कम्पन करे उसको खल्ली (मूलामना) रोग कहते हैं ॥ ऊर्ध्ववातके लक्षण टीकाकारने लिखे हैं- अधः प्रतिहतो वायुः श्लेष्मणा मारुतेन च । करोत्युद्गारबाहुल्यमूर्ध्ववातं प्रचक्षते ॥ ७२ ॥ कफवातकरके पीडित नीचेकी वायु डकार बहुत लावे उस वातको ऊर्ध्व वात कहते हैं ॥ परन्तु तोडरानन्दने कुछ विलक्षण लिखा है । यथा- भुक्तेऽप्यभुक्ते सुप्ते वा यस्योद्गारः प्रजायते । सततं घोषवांश्चाति ह्युर्ध्ववातं तमादिशेत् ॥ ७३ ॥ भोजन करनेके पीछे अथवा भोजनके पहिले अथवा सोनेके समय डकार निरंतर शब्दवान् आवे उसको ऊर्ध्ववात कहते हैं ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA