भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 404 में से

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पृष्ठ 187

भाषाटीकासमेत । (१६९) वस्तिमेहनयोः शूलं मूत्रकृच्छ्रं शिरोरुजा । विनामो वंक्षणानाहः स्याल्लिङ्गं मूत्रनिग्रहे ॥ ४ ॥ मूत्रके वेग रोकनेसे बस्ति ( मूत्राशय ) और शिश्न इंद्रिय इनमें पीडा होय, मूत्र कष्टसे उतरे, मस्तककी पीडासे शरीर सीधा होय नहीं, पेटमें अफरा होय ॥ मन्यागलस्तम्भशिरोविकारा जृंभोपरोधात्पवनात्मकाः स्युः । तथाऽक्षिनासावदनामयाश्च भवन्ति तीव्राः सह कर्णरोगैः ॥ ५ ॥ जम्भाई आती हुईके रोकनेसे, मन्या कहिये नाडीके पीछेकी नस और गला इनका और वातजन्य विकार मस्तकमें होयँ, उसी प्रकार नेत्ररोग, नासारोग, मुख- रोग और कर्णरोग ये तीव्र होते हैं ॥ आनन्दजं वाप्यथ शोकजं वा नेत्रोदकं प्राप्तममुञ्चतो हि । शिरोगुरुत्वं नयनामयाश्च भवन्ति तीव्राः सह पीनसेन ॥ ६ ॥ आनन्दसे अथवा शोकसे प्रकट अश्रुपातका जो मनुष्य नहीं त्याग करे उसके इतने रोग प्रगट होयँ-मस्तक भारी रहे, नेत्ररोग और पीनस ये प्रबल हों ॥ मन्यास्तम्भशिरःशूलमर्दिताधर्धावभेदकौ । इन्द्रियाणां च दौर्बल्यं क्षवथोः स्याद्विधारणात् ॥ ७ ॥ मन्या ( नाडके पिछाडीकी नस ) का स्तम्भ कहिये जकड जाना, शिरमें शूलका चलना, आधा मुख टेढा हो जाय, अर्धांगवात और सब इंद्रिय दुर्बल होजायँ इतने रोग आती हुई छींक रोकनेसे होते हैं ॥ कण्ठास्यपूर्णत्वमतीव तोदः कूजश्च वायोरथवाऽप्रवृत्तिः । उद्गारवेगेऽभिहते भवन्ति घोरा विकाराः पवनप्रसूताः ॥ ८ ॥ आती हुई डकारके वेग रोकनेसे वातजन्य इतने रोग होते हैं-कण्ठ और मुख भारीसा मालूम होय, अत्यन्त नोचनेकीसी पीडा होय, अव्यक्त भाषण ( जो समझमें न आवे ) ॥ कण्डूकोठारुचिव्यङ्गशोफपाण्ड्वामयज्वराः । कुष्ठहृल्लासवीसर्पाऽश्छर्दिनिग्रहजा गदाः ॥ ९ ॥ जो मनुष्य आतीहुई वमनके वेगको रोके उसके अंगोंमें खुजली चले, देहमें चकत्ते हो जायँ, अरुचि, मुखपर झांईंसी पडे, सूजन, पांडुरोग, ज्वर, कुष्ठ, खाली रह, विसर्प ये होयँ ॥

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