माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १८४ ) माधवनिदान । मूत्रशुक्रके लक्षण । मूत्रितस्य स्त्रियं यातो वायुना शुक्रमूद्धतम् । स्थानाच्च्युतं मूत्रयतः प्राक्पश्चाद्वा प्रवर्तते ॥ १४ ॥ भस्मोदकप्रतीकाशं मूत्रशुक्रं तदुच्यते । मूत्रबाधाको रोकके जो मनुष्य स्त्रीसंग करे उसके वायु शुक्रको उडाय स्थानसे भ्रष्ट करे, तब मूतनेके पहिले अथवा मूतनेके पीछे शुक्र गिरे और उसका वर्ण राख मिले पानीके समान होय, उसको मूत्रशुक्र कहते हैं ॥ उष्णवातके लक्षण । व्यायामाध्वातपैः पित्तं बस्तिं प्राप्यानिलायुतम् ॥ १५ ॥ बस्तिं मेढ्रं गुदं चैव प्रदहेत्स्त्रावयेदधः । मूत्रं हारिद्रमथवा सरक्तं रक्तमेव च ॥ कृच्छ्रात्पुनःपुनर्जन्तोरुष्णवातं वदन्ति तम् ॥ १६ ॥ व्यायाम ( दण्ड कसरत ), अति मार्गका चलना और धूपमें डोलना इन कार- णोंसे कुपितभया जो पित्त सो बस्तिमें प्राप्त हो वायुसे मिल बस्ति, लिंग और गुदा इनमें दाह करे और हलदीके समान अथवा कुछ रक्तसे युक्त वा लाल ऐसा मूत्रका स्राव बारम्बार कष्टसे होय, उसको उष्णवात रोग कहते हैं । यही रोग सुजाकके नामसे भाषामें बोला जाता है ॥ मूत्रसादके लक्षण । पित्तं कफो द्वावपि वा संहन्येतेऽनिलेन चेत् । कृच्छ्रान्मूत्रं तदा पीतं रक्तं श्वेतं घनं सृजेत् ॥ १७ ॥ सदाहं रोचनाशङ्खचूर्णवर्णं भवेत्तु तत् । शुष्कं समस्तवर्णं वा मूत्रसादं वदन्ति तम् ॥ १८ ॥ पित्त अथवा कफ वा दोनों वायुकरके बिगडे हुए होयें, तब मनुष्य पीला, लाल, सफेद, गाढा ऐसा कष्टसे मूते और मूतनेके समय दाह होय और जब वह मूत्र पृथ्वीमें सूख जाय तब गोरोचन, शंखका चूर्ण ऐसा वर्ण होय अथवा सर्व वर्णका होय इस रोगको मूत्रसाद कहे हैं ॥ विड्विघातके लक्षण । रूक्षदुर्बलयोर्वातेनोदावर्त्तं शकृद्यदा ॥ १९ ॥ मूत्रस्रोतोऽनुपद्येत विट्सृष्टं तदा नरः । विड्गन्धं मूत्रयेत्कृच्छ्राद्विड्विघातं विनिर्दिशेत् ॥ २० ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA