भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेत । (२१३) वान्‌से वैर करना, कठिन धनुषका ईंचना इत्यादिक ऐसे और कारणोंसे कुपित भई जो वायु सो छोटी आंतोंके अवयवोंके एकदेशको विगाडकर अर्थात् उसका संकोच कर अपने रहनेके स्थानसे उसको नीचे ले जाय तब वंक्षणसंधिमें स्थित होकर उस स्थानमें गांठके समान सूजनको प्रगट करे ॥ इसकी औषधि न करनेका परिणाम । उपेक्षमाणस्य च मुष्कवृद्धिमाध्मानरुक्स्तंभवर्तीं स वायुः । प्रपीडितोऽन्तः स्वनवान्प्रयाति प्रध्मापयेन्नेति पुनश्च मुक्तः॥ ९॥ जिस अण्डवृद्धिसे अफरा होय, पीडा होय, जडता होय उसकी उपेक्षा करनेसे अर्थात् औषध न करनेसे तथा अण्डकोशोंके दबानेसे जो वायु कोंकों शब्द करै तथा हाथके दाबनेसे वायु ऊपरको चढ जाय और छोडनेसे फिर नीचे उतरकर अण्डोंको फुलाय दे ये होते हैं ॥ असाध्य लक्षण । क्षुद्रान्त्रावयवाच्छ्लेष्मा मुष्कयोर्वातसञ्चयात् । अण्डवृद्धिरसाध्योऽयं वातवृद्धिसमाकृतिः ॥ १० ॥ छोटी आंतोंके अवयव ( अंगवाला ) कफ वातके सञ्चयसे मुष्कके विषे प्राप्त होय तथा जिसमें वातके लक्षण कहे वे सब मिलते होयँ वह अण्डवृद्धि असाध्य है ॥ वध्म्र अर्थात् बदरोगका निदान ग्रन्थान्तरमें लिखा है यथा- वध्म्ररोगनिदान । अत्याभिष्यन्दिगुर्वामसेवनान्निचयं गतः ॥ ११ ॥ करोति ग्रन्थिवच्छोफं दोषो वंक्षणसन्धिषु । ज्वरशूनाङ्गदाहाढ्यं तं वध्म्रमिति निर्दिशेत् ॥ १२ ॥ यस्य पूर्वं फिरंगाख्यो रोगो भूत्वा प्रशाम्यति । तस्य जन्तोर्वध्म्ररोग इत्युक्तं सुश्रुतादिभिः ॥ १३ ॥ तथोष्णवातजुष्टस्य मेढ्रव्रणयुतस्य च । तस्य पुंसो वध्म्ररोगं प्रवदन्ति भिषग्वराः ॥ १४ ॥ अभिष्यंदि वस्तुके खानेसे, भारी अन्नके खानेसे, कच्चे अन्नके खानेसे वृद्धिके प्राप्त हुए दोष अथवा “अत्यभिष्यंदिगुर्वाम” इस जगह “अत्यभिष्यंदिगुर्वन्नशुष्कपूज्या- मिषाशनात् ” ऐसा भी पाठ है अर्थात् अभिष्यंदि भारी अन्नके खानेसे तथा सूखा