माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 265, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( २४७ ) अथ फिरंगरोगनिदानम् । उपदंशरोगका ही भेद फिरंगरोग है उसको ग्रन्थान्तरसे लिखते हैं- फिरंगशब्दकी निरुक्ति। फिरङ्गसंज्ञके देशे बाहुल्येनैव यद्भवेत् । तस्मात्फिरंग इत्युक्तो व्याधिर्व्याधिविशारदैः ॥ १ ॥ फिरंगियोंके देशमें यह रोग बहुधा होता है, इसीसे वैद्य फिरंगरोग कहते हैं ॥ विप्रकृष्ट निदान । गन्धरोगः फिरंगोऽयं जायते देहिनां ध्रुवम् । फिरंगिनोऽङ्गसंसर्गात्फिरंगिण्याः प्रसंगतः ॥ भवेत्तं लक्षयेत्तेषां लक्षणैर्भिषजां वरः ॥ २ ॥ गन्धरोग यह फिरंग रोग है सो मनुष्योंके अंग्रेजोंके संसर्गसे अथवा फिरंगिणी ( मेम ) के प्रसंग करनेसे होता है, इसको इसके आगे जो लक्षण कहेंगे उनसे जानना ॥ इसका रूप । फिरंगस्त्रिविधो ज्ञेयो बाह्य आभ्यन्तरस्तथा । बहिरन्तर्भवश्चापि तेषां लिङ्गानि च ब्रुवे ॥ ३ ॥ फिरंगरोग तीन प्रकारका है-१ बाहर होय, २ भीतर होय है और तीसरा बाहर भीतर दोनों स्थानमें होय है, उनके लक्षण कहता हूं ॥ तत्र बाह्यः फिरंगः स्याद्विस्फोटसदृशाल्परुक् । स्फुटितो व्रणवद्वैद्यैः सुखसाध्योऽपि स स्मृतः ॥ ४ ॥ तहां बाहरका फिरंगरोग फोडेके समान थोडी पीडाकर्त्ता होय है और फोडेके समान ही फूटे हैं, यह सुखसाध्य है ॥ संधिष्वाभ्यन्तरः स स्यादुभयोर्लक्षणैर्युतः । कष्टदोऽतिचिरस्थायी कष्टसाध्यतमश्च सः ॥ ५ ॥ और जो फिरंग सन्धियोंके भीतर होय अथवा दोनों बाहर और भीतरकी फिरंगके लक्षण मिलते होंय, वह अतिकष्ट देनेवाला बहुत कालतक रहनेवाला कष्टसाध्य है ॥ फिरंगरोगके उपद्रव । कार्श्यं बलक्षयो नासाभंगो वह्नेश्च मंदता । अस्थिशोषोऽस्थिवक्रत्वं फिरंगोपद्रवा अमी ॥ ६ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA