भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेत । ( २५३ ) दाहः कंडूस्त्वचि स्वापस्तोदः कोष्ठोन्नतिः क्लमः । व्रणानामधिकं शूलं शीघ्रोत्पत्तिश्चिरस्थितिः ॥ ९ ॥ रूढानामपि रूक्षत्वं निमित्तेऽल्पेऽपि कोपनम् । रोमहर्षोऽसृजः काष्र्ण्यं कुष्ठलक्षणमग्रजम् ॥ १० ॥ जिस ठिकाने कुष्ठ होनहार होय उस जगह हाथोंसे अत्यन्त चिकना मालूम होय अथवा खरदरा मालूम होय, उस ठिकाने पसीने आवे अथवा नहीं आवे तथा उस ठिकानेका वर्ण पलट जाय, दाह होय, खुजली चले, त्वचाको स्पर्श मालूम न होय, नोचनेकीसी पीडा होय, विषैली माखीके काटनेके सदृश चकत्ते उठे, परि- श्रम करे विना देहमें श्रम होय, व्रणमें पीडा अधिक होय, उन फोडोंकी उत्पत्ति शीघ्र होकर बहुत दिवसपर्यंत रहे, जब फोडा भरनेको होय तब रूखे रहें उनका थोडे निमित्त होनेसे कोप होय, रोमांच होय और रुधिर काला पडजाय, ये कुष्ठ होनेके पूर्वरूप होते हैं ॥ सप्त महाकुष्ठोंके लक्षण । कृष्णारुणकपालाभं यद्रूक्षं परुषं तनु । कापालं तोदबहुलं तत्कुष्ठं विषमं स्मृतम् ॥ ११ ॥ कापालकुष्ठ जो काले तथा लाल खोपडीके सदृश, रूखे, खरखरे, पतले ऐसे त्वचावाले तथा नोंचनेकीसी अधिक पीडायुक्त होयँ, वे दुश्चिकित्स्य हैं अर्थात् चिकित्सा करनेमें कठिन हैं। इसको कापालकुष्ठ कहते हैं ॥ औदुम्बरकुष्ठके लक्षण । रुग्दाहरागकंडूभिः परीतं लोमपिंजरम् । उदुंबरफलाभासं कुष्ठमौदुंबरं वदेत् ॥ १२ ॥ औदुम्बरकुष्ठ शूल, दाह लाल और खुजली इनसे व्याप्त होय, इसमें बाल कपिलवर्णके होयँ तथा ये गूलरफलके समान होते हैं ॥ मण्डलकुष्ठके लक्षण । श्वेतं रक्तं स्थिरं स्त्यानं स्निग्धमुत्सन्नमंडलम् । कृच्छ्रमन्योन्यसंयुक्तं कुष्ठं मंडलमुच्यते ॥ १३ ॥ मण्डलकुष्ठ सफेद, लाल, कठिन, गीला अथवा जलयुक्त, चिकना, जिसका आकार मण्डलके सदृश ऊपरको उठा होय तथा एक दूसरेसे मिला होय, ऐसा यह मण्डलकुष्ठ कष्टसाध्य है ॥