भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 283

भाषाटीकासमेत । ( २६६ ) अथ विसर्पनिदानम् । ━◇━ विसर्पकी निदानपूर्वक संख्यारूप सम्प्राप्ति और निरुक्ति । लवणाम्लकटूष्णादिसंसेवाद्दोषकोपतः । विसर्पः सप्तधा ज्ञेयः सर्वतः परिसर्पणात् ॥ १ ॥ खारी, खट्टा, कडुवा, गरम आदि पदार्थ सेवन करनेसे वातादि दोषोंका कोप होकर सात प्रकारका विसर्प रोग होय है, वह सर्वत्र फैलजाय, इसीसे इसको विसर्प कहते हैं सो चरकमें लिखा भी है ॥ पृथक् त्रयस्त्रिभिश्चैको विसर्पा द्वंद्वजास्त्रयः । वातिकः पैत्तिकश्चैव कफजः सान्निपातिकः ॥ चत्वार एते वीसर्पा वक्ष्यन्ते द्वंद्वजास्त्रयः ॥ २ ॥ आग्नेयो वातपित्ताभ्यां ग्रन्ध्याख्यः कफवातजः । यस्तु कर्दमको घोरः स पित्तकफसम्भवः ॥ ३ ॥ वातिक १, पैत्तिक १, श्लैष्मिक १, सान्निपातिक १, द्वन्द्वज ३ इस तरह सात प्रकारका विसर्परोग है । २ वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक, सान्निपातिक ये चार प्रकारके विसर्प हैं और तीन जो द्वन्द्वज उनको अब कहेंगे, वातपित्तसे आग्नेय, कफवातसे ग्रन्थ्याख्य, कफपित्तसे घोर कर्दमके नामवाला विसर्प होता है ॥ सर्वप्रकारके विसर्प रक्तादिक चार दूष्य और वातादि तीन दोष इनसे होते हैं सो कहते हैं- रक्तं लसीकात्वङ्मांसं दूष्यं दोषास्त्रयो मलाः । विसर्पाणां समुत्पत्तौ विज्ञेयाः सप्त धातवः ॥ ४ ॥ रुधिर, मांसका जल, त्वचा, मांस ये दूष्य और वातादि तीन दोष ये सात धातु विसर्पके उत्पन्न होनेके कारण हैं ॥ वातविसर्पके लक्षण । तत्र वातात्परीसर्पो वातज्वरसमाकृतिः । शोफस्फुरणनिस्तोदभेदपामार्तिहर्षवान् ॥ ५ ॥ ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━ १ विविधं सर्पति यतो विसर्पस्तेन स स्मृतः । परिसर्पोऽथ वा नाम्ना सर्वतः परिसर्पणात् ॥ इति । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA