भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेत । ( २७९ ) वातपित्तसे प्रगट एक गोल ऊंचा तथा लाल और फोडोंसे व्याप्त ऐसा मंडल होय वह बहुत दूखे उसको गर्दभिका कहते हैं ॥ पाषाणगर्दभके लक्षण । वातश्लेष्मसमुद्भूतः श्वयथुर्हनुसंधिजः । स्थिरो मन्दरुजः स्निग्धो ज्ञेयः पाषाणगर्दभः ॥ १० ॥ वातकफसे ठोडीकी सन्धिमें कठिन, मन्द पीडा करनेवाली चिकनी ऐसा सूजन होथ उसको पाषाणगर्दभ कहते हैं ॥ पनसिके लक्षण । कर्णस्याभ्यन्तरे जातां पिडिकामग्रवेदनाम् । स्थिरां पनसिकां तां तु विद्याद्वातकफोत्थिताम् ॥ ११ ॥ कानके भीतर वात पित्त कफसे जो फुन्सी उग्रवेदना सहित प्रगट होय और वह स्थिर होय, उसको पैनसिका कहते हैं ॥ जालगर्दभके लक्षण । विसर्पवत्सर्पति यः शोथस्तनुरपाकवान् । दाहज्वरकरः पित्तोत्स ज्ञेयो जालगर्दभः ॥ १२ ॥ पित्तसे विसर्पके समान इधर उधरको फैलनेवाली पतली तथा कुछ पकनेवाली ऐसी सूजन होय, उसमें दाह होय और ज्वर होय, इसको जालगर्दभ कहते हैं, कोई आचार्य कहते हैं कि, इसमें पकना नहीं होय ॥ इरिबेल्लिकाके लक्षण । पिडिकामुत्तमांगस्थां वृत्तामुग्ररुजाज्वराम् । सर्वात्मिकां सर्वलिंगां जानीयादिरिवेल्लिकां ॥ १३ ॥ त्रिदोषसे प्रगट मस्तकमें गोल अत्यन्त पीडा और ज्वर करनेवाली त्रिदोषके लक्षण संयुक्त ऐसी पिडिका होय उसको इरिबेल्लिका कहते हैं ॥ कक्षा (कखलाई) के लक्षण । बाहुकक्षांसपार्श्वे तु कृष्णस्फोटां सवेदनाम् । पित्तकोपसमुद्भूतां कक्षामित्यभिनिर्दिशेत् ॥ १४ ॥ १ कफवातौ प्रकुपितौ मांसमाश्रित्य कर्णयोः । समन्ततः परिस्तब्धां कुरुतः पिडिकां स्थिराम् ॥ विषमां दाहसंयुक्तां विद्यात्पनसिकां तु ताम् ॥ २ पित्तोत्कटास्त्रयो दोषा जन- यंति त्वगाश्रिताः । श्यावं रक्तं तनुं शोथमपाकं बहुवेदनम् ॥ विसर्पिणं सदाहं च तृष्णाज्वर- समन्वितम् । विसर्पमाहुस्तं व्याधिमपरे जालगर्दभम् ॥