माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( २८३ ) दारुणकके लक्षण । दारुणा कण्डुरा रूक्षा केशभूमिः प्रपच्यते । कफमारुतकोपेन विद्याद्दारुणकं तु तम् ॥ २९ ॥ कफवायुके कोपसे केशोंकी जमीन अतिकठिन होकर खुजावे, खरदरी होय तथा बारीक फुन्सी होकर पके उसको दारुणक कहते हैं, कफवातके कोपसे यह रोग होय है. इसका कारण यह है कि बिना पित्तके पाक नहीं होय सो विदेहने कहा भी है ॥ अरूंषिकाके लक्षण । अरूंषि बहुवक्त्राणि बहुक्लेदीनि मूर्धनि । कफासृक्कृमिकोपेन नृणां विद्यादरूंषिकाम् ॥ ३० ॥ रुधिर कफ और कृमि इनके कोपसे माथेमें बहुत फुन्सी हो जायँ, उनमेंसे चोप विशेष निकले और क्लेदयुक्त होयँ इन फुन्सियोंको अथवा व्रणोंको अरूंषिका कहते हैं ॥ पलित ( सफेद बाल ) के लक्षण । क्रोधशोकश्रमकृतः शरीरोष्मा शिरोगतः । पित्तं च केशान्पचति पलितं तेन जायते ॥ ३१ ॥ क्रोध शोक और श्रमके करनेसे उत्पन्न भई जो शरीरमें ऊष्मा ( गरमी ) और पित्त सो मस्तकमें जाकर बालोंको पकाय दे अर्थात् सफेद करदे उस करके यह पलितरोग होय है । पलित रोगपर मधुकोशटीकाकारने तथा भावप्रकाशने शास्त्रार्थ लिखा है ॥ मुखदूषिकाके लक्षण । शाल्मलीकण्टकप्रख्याः कफमारुतकोपजाः । जायन्ते पिडिकायूनां विज्ञेया मुखदूषिकाः ॥ ३२ ॥ कफवायुके कोपसे सेमरके कांटेके समान तरुण ( जवान ) पुरुषके मुखके ऊपर जो फुन्सी होयँ उनको मुखदूषिका अर्थात् मुहासे कहते हैं । इनके होनेसे मुख बुरा हो जाता है ॥ १ यद्वन्न पाटलाभासं सरजस्कं शिरस्त्वचि । परुषं जायते जन्तोस्तस्य रूपं विशेषतः ॥ बोदैः समन्वितं वातात्सकण्डूगौरवं कफात् । सपिपासं सदाहार्तिरोगं पित्तासृजं तथा ॥