माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( २८९ ) तिनमें ८ होठके रोगोंकी संप्राप्ति । अनूपपिशितक्षीरदधिमाषादिसेवनात् । मुखमध्ये गदान्कुर्युः क्रुद्धा दोषाः कफोत्तराः ॥ २ ॥ जलसंचारी प्राणियोंके मांस, दूध, दही, उड़द् आदि पदार्थोंके सेवन करनेसे कुपित भये कफादिक दोष मुखमें रोग उत्पन्न करते हैं ॥ वातिक ओष्ठरोगके लक्षण । कर्कशौ परुषौ स्तब्धौ कृष्णौ तीव्ररुजान्वितौ । दाल्येते परिपाट्येते ओष्ठौ मारुतकोपत: ॥ ३ ॥ वादीके कोपसे होठ कर्कश, खरदरे, कठोर और काले होते हैं उनमें तीव्र पीडा होय व दो टुकडोंके समान होजाय तथा होठकी त्वचा किंचित् फटजाय ॥ पैत्तिकके लक्षण । चीयते पिडिकाभिस्तु सरुजाभिः समन्ततः । सदाहपाकपिडिकौ पीतभासौ च पित्ततः ॥ ४ ॥ पित्तसे होठ चारों ओर फुन्सियोंसे व्याप्त हों, उनमें पीडा होय तथा पकजावे और पीलेसे दीखें इसमें जो दाह और पाक कहे हैं सो विशेषताके सूचक हैं ॥ श्लैष्मिकके लक्षण । सवर्णाभिस्तु चीयेते पिडिकाभिरवेदनौ । भवतस्तु कफादोष्ठौ पिच्छिलौ शीतलौ गुरु ॥ ५ ॥ कफसे होठ त्वचाके समान वर्णवाली फुन्सियोंसे व्याप्त हों, कुछ दूखें, तथा मलाईके समान और शीतल तथा भारी हों ॥ सान्निपातिकके लक्षण । सकृत्कृष्णौ सकृत्पीतौ सकृच्छ्वेतौ तथैव च । सन्निपातेन विज्ञेयावनेकापिडिकान्वितौ ॥ ६ ॥ सन्निपातसे होठ कभी काले, कभी पीले, उसी प्रकार कभी सफेद तथा अनेक प्रकारकी फुन्सियोंसे व्याप्त होयें ॥ रक्तजके लक्षण । खर्जूरफलवर्णाभिः पिडिकाभिर्निपीडितौ । रक्तोपसृष्टौ रुधिरं स्रवतः शोणितप्रभौ ॥ ७ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA