माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत। ( १३ ) ज्वर सो आठ प्रकारका है-वात, पित्त, कफ इनसे ३, द्वंद्वज ३ सन्निपात १ और आगंतुज १ ऐसे मिलकर संक्षेपसे ज्वर आठ प्रकारका है ॥ इस श्लोकमें-“ निःश्वाससम्भव ” यह जो पद धरा है सो श्वास यहां क्रोधके लक्षण करके कहा है किन्तु ज्वरकी श्वाससे उत्पत्ति नहीं है क्योंकि, जैसे सुश्रुतमें लिखा है यथा-“ रुद्रकोपाग्निसंभूतः सर्वभूतप्रतापनः” इति । अर्थात् क्रोधित रुद्रनें ललाटस्थ तीसरे अग्निमय चक्षु ( नेत्र ) को स्पर्श कर आग्नेयबाण निर्माण किया । तथा च चरके-“ स्पृष्ट्वा ललाटे चक्षुर्वै दग्ध्वा तानसुरान्प्रभुः । बाणं क्रोधाग्निसंतप्त- मसृजच्छत्रुनाशनम्॥” इत्यादिक वाक्योंसे ज्वरमात्रकी पित्तप्रकृति जाननी, प्रयोजन यह है कि सर्वज्वरमें पित्तकी विरोधी क्रिया न करे। सो वाग्भटने कहा है यथा-“ऊष्मा पित्तादृते नास्ति नात्युष्माणं विना ज्वरः । तस्मात्पित्तविरुद्धानि त्यजेत्पित्ताधिके- ऽधिकम् ॥ ” इति । अर्थात् गरमी पित्तके विना नहीं होती और ज्वर गरमीके विना नहीं होता इसीसे ज्वरमें पित्तविरुद्ध क्रिया न करे और पित्तज्वरमें विशेषकरके पित्तविरुद्ध क्रिया त्याज्य है । अन्य आचार्य कहते हैं कि-श्रीरुद्रसे उत्पत्ति होनेसें ज्वर देवता है इस लिये ज्वरका पूजन करनेसे शांत होता है, जैसे विदेहका वाक्य है-“ज्वरस्तु पूजनैर्वापि सहसैवोपशाम्यति ” और ज्वरका स्वरूप भी हरिवंशमें लिखा है यथा-“ ज्वरस्त्रिपादस्त्रिशिराः षड्भुजो नवलोचनः । भस्मप्रहरणो रौद्रः कालान्तक- यमोपमः ॥ ” इति । अर्थात् ज्वरके तीन चरण, तीन मस्तक, छः भुजा, नव नेत्र, भस्मयुक्त देह, रौद्र, कालका भी काल और यमराजके समान है ॥ ज्वरकी सम्प्राप्ति । मिथ्याहारविहाराभ्यां दोषा ह्यामाशयाश्रयाः । बहिर्निरस्य कोष्ठाग्निं ज्वरदाः स्यू रसानुगाः ॥ ३ ॥ मिथ्या आहार ( देश काल प्रकृति आदिसे विरुद्ध और संयोगविरुद्ध भोजन ) जो दोष ( वात, पित्त, कफ ) सो नाभिस्तनके बीच आमाशयमें प्राप्त हों रसको मिथ्याविहार ( देहके पुरुषार्थसे विशेष कामका करना ) इन कारणोंसे दुष्ट हुए बिगाडकर और कोष्ठस्थानमें रहती हुई जो अग्नि उसको देहके बाहर निकाल करके प्रगट करनेवाले होते हैं ॥ यह सम्प्राप्ति शरीररोगोंकी है आगन्तुजकी नहीं है, क्योंकि, आगन्तुज रोगोंका १-अकाले चातिमात्रं च असात्म्यं यच्च भोजनम् । विषमाशनं च यद्भूक्तं मिथ्याहारःस उच्यते॥ २-अशक्तः कुरुते कर्म शक्तिमात्रं करोति वा।मिथ्याविहारमित्युक्तं सदा चैव विवर्जयेत् ॥ ३-नाभिस्तनान्तरं जन्तोरामाशय इति स्मृतः ॥