माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( १५ ) और अग्निका ग्रहण है अर्थात् इनकी बारबार इच्छा और द्वेष, ये चरकका मत है । तदुक्तं चरके-“ ज्वलनातपवाम्ब्वम्बुभक्तद्वेषाभिलाषिता ” इति । अन्ये तु 'शैत्यौ- ष्ण्यसाधर्म्याजलानलौ गृह्णन्ति ते तु आदिशब्देन शयनादिकं मन्यन्ते' और अन्य आचार्य सर्दी गर्मीके साधर्म्यसे जल अग्निको कहते हैं और वे आदिशब्दसे शयन आदि मानते हैं जम्भाई अंगोंका टूटना, देह भारी रोमांचोंका होना, अन्नमें अरुचि अँधेरीके आना, आनन्दकी निवृत्ति सर्दीका लगना. शंका--क्योंजी! पूर्व कहि आये कि सर्दी गरमीकी बार २ इच्छा और बार बार द्वेष पुनः शीत पद क्यों धरा ? उत्तर--इस पदके धरनेसे सर्दीकी अधिकता दिखाई अर्थात् सर्दी विशेष लगे ये लक्षण ज्वरके पूर्व होते हैं ॥ सामान्यतो विशेषात्तु जृम्भात्यर्थं समीरणात् । पित्तान्नयनयोर्दाहः कफान्नान्नाभिनन्दनम् ॥ ७ ॥ विशेषकरके वातज्वरमें जम्भाई बहुत आती हैं, पित्तज्वरमें नेत्रोंमें दाह होता है और कफज्वरमें अरुचि होती है ॥ वातज्वरके लक्षण । वेपथुर्विषमो वेगः कण्ठौष्ठमुखशोषणम् । निद्रानाशः क्षवस्तंभो गात्राणां रौक्ष्यमेव च ॥ ८ ॥ शिरोहृद्गात्ररुग्वक्त्रवैरस्यं गाढविट्कता । शूलाध्माने जृंभणं च भवन्त्यनिलजे ज्वरे ॥ ९ ॥ कंप होना, ज्वरका विषमवेग, कण्ठ, होठ, मुख इनका सूखना, निद्राका नाश, छींकका न आना, देहका रूखापना, चकारसे नेत्र, विष्ठा, मूत्र इनका काला होना और आचार्य--“ रौक्ष्यमेव च ” इस जगह “ श्यावांगमलमूत्रता ” ऐसा पाठ कहते हैं और मस्तक हृदय गात्र इनमें पीडा । कोई शंका-करे कि गात्र पदके धर- नेसे ही मस्तक हृदय आदिका बोध होगया फिर मस्तक और हृदय पद क्यों धरा ? उत्तर-इन दोनों पदोंके धरनेसे इनमें दर्दकी अधिकता दिखाई अर्थात् मस्तक हृद- यमें बहुत पीडा होय, मुखकी विरसता, मलका रुकना, शूल, अफरा, जम्भाई ये लक्षण वातज्वरके होते हैं ॥ पित्तज्वरके लक्षण । वेगस्तीक्ष्णोऽतिसारश्च निद्रालपत्वं तथा वमिः । कण्ठोष्ठमुखनासानां पाकः स्वेदश्च जायते ॥ १० ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA