भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 332, कुल 404 में से

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पृष्ठ 332

( ३१४ ) माधवनिदान । कुपित हुए वातादि दोष नेत्रोंकी नसोंमें प्राप्त हो नेत्रोंका भाग व्याप्त करनेसे उनमें भयंकर रोग उत्पन्न होता है, ये वात पित्त कफ रुधिर सन्निपात और आगन्तुक इनसे होनेवाले ऐसे नेत्ररोग ( ७६ ) हैं ॥ नेत्ररोगमें प्रायः अभिष्यंद ( नेत्र आना ) होता है इसीसे प्रथम उसको कहते हैं- वातात्पित्तात्कफाद्रक्तादभिष्यन्दश्चतुर्विधः । प्रायेण जायते घोरः सर्वनेत्रामयाकरः ॥ ५ ॥ वात पित्त कफ और रुधिर इनसे चार प्रकारका अभिष्यन्दरोग होता है। इसकी पीडा नष्ट नहीं होय तथा यह अभिष्यन्दरोग सर्व नेत्ररोगों ( अधिमंथादिक ) का उत्पत्तिस्थान जानना । सो सुश्रुतमें लिखा है । ( इस रोगको भाषामें नेत्र दुखना कहते हैं अथवा आंखआई कहते हैं ) ॥ वाताभिष्यन्दके लक्षण । निस्तोदनस्तम्भनरोमहर्षसङ्घर्षपारुष्यशिरोभितापाः । विशुष्कभावः शिशिराश्रुता च वाताभिपन्ने नयने भवन्ति ॥ ६ ॥ वादीसे नेत्र दुखने आये होयं उनमें सुई चुभानेकीसी पीडा हो, नेत्रोंके स्तम्भन ( ठहरजाना ), रोमांच नेत्रोंमें रेत गिरनेके समान खटके तथा रूक्ष होय, मस्तकमें पीडा हो, नेत्रोंसे पानी गिरे परन्तु नेत्र सूखेसे रहें और नेत्रोंसे आँसू गिरे वह शीतल हो ॥ पित्ताभिष्यन्दके लक्षण । दाहप्रपाकौ शिशिराभिनन्दा धूमायनं बाष्पसमुच्छ्रयश्च । उष्णाश्रुता पीतकनेत्रता च पित्ताभिपन्ने नयने भवन्ति ॥ ७ ॥ पित्तसे नेत्र दुखने आनेसे उनमें बहुत दाह हो, नेत्र पकजायँ, उनमें शीतल पदार्थ लगानेकी इच्छा हो, नेत्रोंसे धूआं निकले अथवा नेत्रोंमें धूआं जानेकीसी पीडा हो, तथा नेत्रोंसे गरम अश्रु ( आंसू ) बहुत पडें, आंख पीलीसी मालूम पडें ॥ कफजाभिष्यन्दके लक्षण । उष्णाभिनन्दा गुरुताभिशोथः कण्डूपदेहावतिशीतता च । स्रावो बहुः पिच्छिल एव चापि कफाभिपन्ने नयने भवन्ति ॥ ८ ॥ कफसे नेत्र दुखने आये हों उसको गरम वस्तु नेत्रोंमें लगानेसे आराम मालूम हो अर्थात् नेत्रमें सेकसा मालूम हो तथा नेत्र भारी होयँ, सूजन हो, खुजली चले, कीचडसे नेत्र दूषित हों, शीतल हों उनमेंसे स्राव होय, सो गाढा और बहुत होय ॥ १ प्रायेण सर्वे नयनामयास्ते भवन्त्यभिष्यन्दनिमित्तमूलाः । इति ॥