माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 334, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३१६ ) माधवनिदान । जिस नेत्ररोगमें पीडा विशेष होय, लाली बहुत होकर चमका चलें, तथा उसमें घर्ष ( रेत गिरनेसे जैसी पीडा होती है वैसी पीडा ) होय और अर्थात् करकण होय, सुई चुभानेकीसी पीडा होय, शूलसा चले और स्रावयुक्त होवे, उन नेत्रोंको आमयुक्त जानना ॥ अंजन लगानेसे तथा हलका अन्न खानेसे ये लक्षण कहे हैं ॥ निरामके लक्षण । मन्दवेदनता कण्डूः संरम्भाश्रुप्रशान्तता । प्रसन्नवर्णता चाक्ष्णोः संपक्वं दोषमादिशेत् ॥ १४ ॥ नेत्रोंमें पीडा कम होवे, खुजली चले, सूजन मन्द होय, आंसुओंका गिरना होय नेत्रोंका वर्ण स्वच्छ होय, ये दोष पक्क होनेके लक्षण हैं ॥ शोथसहित नेत्रपाकके लक्षण । कण्डूपदेहाश्रुयुतः पक्कोदुम्बरसन्निभः । संरम्भी पच्यते यस्तु नेत्रपाकः स शोफजः । शोथहीनानि लिङ्गानि नेत्रपाके त्वशोथजे ॥ १५ ॥ नेत्रोंमें खुजली तथा लेप और आंसुओंसे युक्त हो और पके गूलरके समान लाल होयँ, ये लक्षण शोथसहित नेत्ररोगके हैं और शोथ ( सूजन ) के बिना जो नेत्र- पाक होय, उसमें शोथको छोडकर सब लक्षण होयँ, यह व्याधि त्रिदोषजन्य होय ॥ हताधिमन्थके लक्षण । उपेक्षणादक्षि यदाऽधिमन्थो वातात्मकः सादयति प्रसह्य । रुजाभिरुग्राभिरसाध्य एष हताधिमन्थः खलु नेत्ररोगः ॥ १६ ॥ वातज अधिमन्थकी उपेक्षा करनेसे वह नेत्रोंको सुखाय देवे, सो मनुष्यके नेत्रोंमें तोद् ( सुईके चुभानेकीसी पीडा ), दाहादि भारी पीडा होय, यह हताधिमंथ नामक नेत्ररोग असाध्य है । इसी रोगको विदेह दृष्टिच्युत्क्षेपणं कहते हैं । अथवा दृष्टिनिर्गम तथा सकलाक्षिशोष भी जानना । यही सुश्रुतकाभी मत है इस रोगसे नेत्र सूखे कम- लके समान हो जाते हैं ॥ १ अन्तर्गतः शिराणां तु यदा तिष्ठति मारुतः । स तदा नयनं प्राप्य शीघ्रं दृष्टिं निरस्यति ॥ तस्यां निरस्यमानायां निर्मथन्निव मारुतः । नयनं निर्वमत्याशु शूलतोदादिमन्थनैः ॥ २ अन्तःशिराणां श्वसनः स्थितो दृष्टिं च प्रक्षिपन् । हताधिमन्थं जनयेत्तमसाध्यं विदुर्बुधाः ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA