माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ३२० ) माधव निदान । अक्षिपाकात्ययके लक्षण । श्वेतः समाक्रामति सर्वतो हि दोषेण यस्यासितमण्डलं तु । तमक्षिपाकात्ययमक्षिपाकं सर्वात्मकं वर्जयितव्यमाहुः ॥ २९ ॥ नेत्रके कृष्णभागमें दोषोंके योगसे चारों ओर सफेद ( शुक्र ) फैल जावे यह सन्निपातजन्य अक्षिपाकात्ययनामक रोग त्याज्य है ऐसा कहा है ॥ अजकाजातके लक्षण । अजापुरीषप्रतिमो रुजावान् सलोहितो लोहितपिच्छलाश्रु । विगृह्य कृष्णं प्रचयोऽभ्युपैति तच्चाजकाजातमिति व्यवस्येत् ॥३०॥ काले भागमें बकरीके शुष्क विष्ठाके समान, दुखनेवाली, लाल हो और गाढा कुछ कालेंसे आंसू वहे उसको अजकाजात ऐसे जानना चाहिये ॥ इतिकृष्णजरोग ॥ दृष्टिके रोग । पहले पटलमें दोष जानेसे उसके लक्षण । प्रथमे पटले यस्य दोषो दृष्टिं व्यवस्थितः । अव्यक्तानि च रूपाणि कदाचिदथ पश्यति ॥ ३१ ॥ प्रथम पटलमें दोष स्थित होनेसे वह पुरुष अव्यक्तरूप ( घटपटादि पदार्थ ) देखे । दृष्टिका प्रमाण सुश्रुतमें कहा है, यथा- मसूरदलमात्रं तु पंचभूतप्रसादजम् । आधे मसूरदलके समान पञ्चभूत ( पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश ) से प्रगट है । शंका-इस श्लोकमें तो मसूरदलके समान लिखा है फिर आधे मसूरके समान ऐसा अर्थ आपने कैसे किया ? उत्तर-तुमने कहा सो ठीक है परन्तु यह अर्थ हमने निमि आचार्य्यके मतसे लिखा है। यथा-" पंचभूतात्मिका दृष्टिर्मसूरार्द्ध- दलोन्मिता " इति । अब कहते हैं कि मण्डल चार हैं सो सुश्रुतमें लिखा है, यथा- तेजोजलाश्रितं बाह्ये तेष्वन्यत्पिशिताश्रितम् । मेदस्तृतीयं पटलमाश्रितं त्वस्थि चापरम् ॥ पञ्चमांशसमं दृष्टेस्तेषां बाहुल्यमिष्यते ॥ ३२ ॥ १ अजकाजातका भेद विदेह दूसरा कहता है । यथा-कृष्णैरक्षणोर्भवेच्छुक्रं छागलीविट्- समप्रभम् । सांद्रपिच्छिलरक्तास्रात्रित्वग्गा त्वजकेति सः ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA