माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । (३३५) पक्ष्मकोपके लक्षण । प्रचालितानि वातेन पक्ष्माण्यक्षि विशंति हि । घृष्यन्त्यक्षि मुहुस्तानि संरम्भं जनयन्ति च ॥ १०० ॥ असिते सितभागे च मूलकोशात्पतन्त्यपि । पक्ष्मकोपः स विज्ञेयो व्याधिः परमदारुणः ॥ १०१ ॥ वादीसे चलायमान कोएके बाल नेत्रमें प्रवेश करे और वह वारंवार नेत्रसे रगडे जायँ, इसीसे नेत्रके काले वा सफेद भागमें सूजन होय, यह केश (बाल) जडसे टूट जावें, अतएव इस व्याधिको पक्ष्मकोप अथवा उपपक्ष्म कहते हैं। यह बडा दुःखदायक है ॥ पक्ष्मशातके लक्षण । वर्त्म पक्ष्माशयगतं पित्तं रोमाणि शातयेत् । कण्डूं दाहं च कुरुते पक्ष्मशातं तमादिशेत् ॥ १०२ ॥ पलकोंकी जडमें रहनेवाला पित्त कुपित होकर नेत्रोंके बाल जिनको वरुनी अथवा बाफणी कहते हैं उनका नाश करे तथा नेत्रोंमें खुजली चले, दाह होय उसको पक्ष्मशात कहते हैं। इस रोगको भी सुश्रुतने संख्या बढनेके भयसे नहीं लिखा, माधवाचार्यने अन्य ग्रन्थोंके मतसे लिखा है ॥ इति वर्त्मजनिदानम् ॥ नेत्ररोगोंकी संख्या । नव संध्याश्रयास्तेषु वर्त्मजास्त्वेकाविंशतिः । शुक्लभागे दशैकश्च चत्वारः कृष्णभागजाः ॥ १ ॥ सर्वाश्रयाः सप्तदश दृष्टिजा द्वादशैव तु । बाह्यजौ द्वौ समाख्यातौ रोगौ परमदारुणौ ॥ भूय एतान्प्रवक्ष्यामि संख्यारूपचिकित्सितैः ॥ २ ॥ सन्धिमें होनेवाले नेत्ररोग ९ प्रकारके हैं और कोएमें होनेवाले रोग २१ हैं और नेत्रके सफेद भागमें होनेवाले रोग ११ हैं और काले भागके ४ हैं और सर्व- सर अर्थात् सर्व नेत्रमें होनेवाले रोग १७ हैं और दृष्टिके रोग १२ हैं और नेत्रके बाहरके रोग २ हैं (ये हमने संगृहीत श्लोकमें लिखे हैं) ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां नेत्ररोगनिदानं समाप्तम् ॥