भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 381, कुल 404 में से

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भाषाटीकासमेत । ( ३६३ ) इन दोनों विषोंका लक्षण । सौभाग्यार्थं स्त्रियः स्वेदरजोनानांगजान्मलान् । शत्रुप्रयुक्तांश्च गरान्प्रयच्छन्त्यन्नमिश्रितान् ॥ ३३ ॥ तैः स्यात्पाण्डुः कृशोऽल्पाग्निर्ज्वरश्चास्योपजायते । मर्मप्रधमनाध्मानं हस्तयोः शोथलक्षणम् ॥ ३४ ॥ जाठरं ग्रहणीदोषो यक्ष्मगुल्मक्षयज्वराः । एवंविधस्य चान्यस्य व्याधेर्लिङ्गानि निर्दिशेत् ॥ ३५ ॥ घरका अधिकार स्वाधीन करनेको दुष्ट जनोंके कहनेसे पतिको वशीकरण कर- नेके निमित्त स्त्री अपने पतिको पसीना, आर्तव ( रजोदर्शनका रुधिर ) तथा अपनी देहके अनेक अंगोंका मैल अन्नमें मिलाकर खिलाती हैं । अथवा शत्रुकृत विषके प्रयोग अर्थात् वैरी विष अथवा विषके अन्न तथा जलमें मिलाकर खवाय देय, इससे मनुष्य पीला और कृश होय, उसकी अग्नि मन्द होय, सब मर्मोंमें पीडा, पेट फूलजाय, हाथोंमें सूजन, उदररोग, ग्रहणीरोग, राजयक्ष्मा, गुल्म, क्षय, ज्वर इन रोगोंके तथा इसी प्रकारके रोगोंके लक्षण होते हैं । दूषीविषके साध्यादि लक्षण । साध्यमात्मवतः सद्यो याप्यं संवत्सरोषितम् । दूषीविषमसाध्यं तु क्षीणस्याहितसेविनः ॥ ३६ ॥ दूषीविष पेटमें जानेसे तत्काल उपाय करनेसे और रोगी पथ्यसे रहनेसे साध्य है । और वर्ष दिन व्यतीत हो जाय तो याप्य जानना । और क्षीण तथा अपथ्य सेवन करनेवालेके असाध्य होय ॥ लूताविषकी उत्पत्ति । यस्माल्लूनं तृणं प्राप्ता मुनेः प्रस्वेदबिंदवः । तस्माल्लूताः प्रभाष्यन्ते संख्यया तास्तु षोडश ॥ ३७ ॥ विश्वामित्रराजा वसिष्ठकी कामधेनु जबरदस्ती लेकर चला, उस समय वसिष्ठ- जीको क्रोध आया, उससे ललाटमें पसीनेके बिंदु निकले, सो समीप जो कटे तृण गौके चरनेके अर्थ पडे थे उनपर वे बिंदु पडे, इसीसे लूता ( मकडी ) प्रगट हुई, इन मकडियोंकी सोलह जाति हैं । इन सोलहोंके भी दो भेद हैं एक कृच्छ्र- साध्य दूसरी असाध्य ॥