भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 53, कुल 404 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 53

भाषाटीकासमेत । ( ३५ ) सात दिनपर्यंत किंवा दश दिनपर्यंत किंवा बारह दिनपर्यन्त एकसा जो ज्वर निरन्तर रहे और उतरे नहीं तिसको सन्ततज्वर कहते हैं । सात दश बारह ये जो कहे सो अनुक्रम करके वात पित्त कफ इनके उल्बणसे कहे हैं, यह संततज्वर त्रिदो- षज है कारण इसका बारह पदार्थोंका साथ होता है । ऐसे वातादिदोष धातुके प्रमाण मूत्र और मल इनको एक ही समय ग्रसकर सन्ततज्वर उत्पन्न करते हैं । बारह पदार्थ ये हैं-वातादिदोष ३ सप्त धातु ७ मूत्र १ और मल १ मिलकर बारह हुए ॥ सततकादिकोंके लक्षण । अहोरात्रे सततको द्वौ कालाव्नुवर्त्तते । अन्येद्युष्कस्त्वहोरात्र- मेककालं प्रवर्त्तते ॥ ३१ ॥ तृतीयकस्तृतीयेऽह्नि चतुर्थेऽह्नि चतुर्थकः । केचिद्भूताभिपंगोत्थं वदंति विषमज्वरम् ॥ ३२ ॥ काल छः हैं-१ पूर्वाह्न, २ मध्याह्न, ३ अपराह्न, ४ प्रदोष, ५ अर्द्धरात्रि, ६ प्रत्यूष. पूर्वाह्न प्रदोष ये कफके काल हैं, मध्याह्न और अर्धरात्रि ये पित्तके काल हैं, अपराह्न और प्रत्यूष ये वातके काल हैं । सन्ततज्वर दिनरातमें दो समय आता है, ईशानदेव कहते हैं कि, दिनके दो वेला अर्थात् दो वार, रात्रिके दो वेला अथवा दिनके एक वेला और रात्रिके एक वेला, एकके दो वेला अमुक वेलामें आवेगा जैसे ज्वरके आनेका समय नहीं कहा है । अन्येद्युष्कज्वर अहोरात्रिमें एक वेलामें आता है, तृतीयकज्वर जिस दिन आता है उसके तीसरे दिन फिर आता है और चातुर्थिक चौथे दिन आता है और कोई आचार्य इस विषम ज्वरको भूताभिषं- गोत्थ कहते हैं, यह मत सुश्रुताचार्यकोही मान्य है अर्थात् उसने विषमज्वरपर बलि होमादि भूतोचित और कषायपानादिक दोषोचित ऐसी चिकित्सा कही है और विषमज्वर ये प्रायशः आगंतुकका सम्बन्धी है यह चरकने कहा है ॥ उत्कृष्टदोषभेदकरके तृतीयक चतुर्थकोंके दूसरे लक्षण । कफपित्तात्त्रिकग्राही पृष्ठाद्वातकफात्मकः । वातपित्ताच्छिरोग्राही त्रिविधः स्यात्तृतीयकः ॥ ३३ ॥ चातुर्थिको दर्शयति प्रभावं द्विविधं ज्वरः । जङ्घाभ्यां श्लैष्मिकः पूर्वं शिरसोऽनिलसंभवः ॥ ३४ ॥ तृतीयक ज्वर कफ पित्तके जोरसे त्रिकस्थान ( तीन हड्डी ) में पीडा करे है वात कफके जोरसे पीठमें पीडा करे है, वात पित्तके जोरसे मस्तकमें पीडा करे है, ऐसे तृतीयकज्वर तीन प्रकारका है । त्रिकंग्राही जो इसका तात्पर्य यह है कि, त्रिक १ त्रिक कहिये कमर और जंघाके मध्यकी तीन हड्डी ।