भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

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( ३८ ) माधवनिदान । काये दुष्टं यदा पित्तं श्लेष्मा चान्ते व्यवस्थितः । तेनोष्णत्वं शरीरस्य शीतत्वं हस्तपादयोः ॥ ३९ ॥ जिस मनुष्यके कोठेमें पित्त दुष्ट हो और कफ हाथ पैरोंमें दुष्ट होकर स्थित होवे तिस करके सब देह उष्ण रहे और हाथ पग शीतल रहें ॥ इन्होंका विपरीत द्वितीय ज्वर । काये श्लेष्मा यदा दुष्टः पित्तं चान्ते व्यवस्थितम् । शीतत्वं तेन गात्राणामुष्णत्वं हस्तपादयोः ॥ ४० ॥ जिस समय कोठेमें कफ दुष्ट हो और पित्त हाथ पैरोंमें दुष्ट होकर रहे तब शरीर शीतल हो और हाथ पैर उष्ण होंयँ ॥ शीतपूर्वकज्वरके लक्षण । त्वक्स्थौ श्लेष्मानिलौ शीतमादौ जनयतो ज्वरम् । तयोः प्रशान्तयोः पित्तमन्ते दाहं करोति च ॥ ४१ ॥ कफ और वात ये दुष्ट होकर त्वचा में प्राप्त हों अर्थात् रसधातुका आश्रय कर प्रथम शीतज्वर उत्पन्न करते हैं और जब इनका वेग शांत होता है तब पिछाडी पित्त दाह करे है ॥ दाहपूर्वकज्वरके लक्षण । करोत्यादौ तथा पित्तं त्वक्स्थं दाहमतीव च । तस्मिन्प्रशान्ते त्वितरौ कुरुतः शीतमन्ततः ॥ ४२ ॥ द्वावेतौ दाहशीतादिज्वरौ संसर्गजौ स्मृतौ । दाहपूर्वस्तयोः कष्टः सुखसाध्यतमोऽपरः ॥ ४३ ॥ उसी प्रकार पहिले पित्त रसगत होकर अत्यन्त दाह करे है, पीछे उसका वेग शांतहुएपर वात कफ ये शीत करते हैं । दाहपूर्वक और शीतपूर्वक ये दोनों ज्वर संसर्ग अर्थात् त्रिदोषोंके सम्बन्धसे होते हैं, ऐसे ऋषियोंने कहा है उनमें दाहपूर्वक ज्वर दुःखप्रद और कृच्छ्रसाध्य है और शीतपूर्वक ज्वर सुखसाध्य है ॥ सप्तधातुगत ज्वर । रसगतज्वरके लक्षण । गुरुता हृदयोत्क्लेशः सदनं छर्द्यरोचकौ । रसस्थे तु ज्वरे लिङ्गं दैन्यं चास्योपजायते ॥ ४४ ॥ रसधातुमें स्थित ज्वर होय तो देह भारी, दोषोंको हृदयमें स्थित होनेसे उपस्थित वमनसी मालूम हो, ग्लानि,ओकारी,अरुचि और दैन्य कहिये मनमें खेद ये चिह्न होते हैं॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA