माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 58, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४० ) माधवनिदान । रसादि धातुगत ज्वर शुक्रस्थानमें पहुंचनेसे रोगीका मरण होता है, इस ज्वरमें लिंगका जकडजाना और शुक्रका विशेष छूटना और सुश्रुतादिक आचार्य कहते हैं कि रक्तादि पदार्थोंका थोडा २ स्राव होता है ॥ प्राकृत और वैकृत ज्वरका लक्षण । वर्षाशरद्वसन्तेषु वाताद्यैः प्राकृतः क्रमात् । वैकृतोऽन्यः सुदुःसाध्यः प्राकृतश्चानिलोद्भवः ॥ ५१ ॥ वर्षाऋतु शरदृतु और वसंतऋतु इसके मध्यमें वातादिकके क्रमसे जो ज्वर होय वह प्राकृत कहाता है जैसे वर्षाकालमें वातज्वर, शरत्कालमें पित्तज्वर और वसन्त कालमें कफज्वर, इससे विपरीत जो ज्वर हो उसको वैकृतज्वर कहते हैं जैसे-वर्षा- कालमें पैत्तिक, शरदऋतुमें श्लैष्मिक और वसन्तऋतुमें वातिक, यह वैकृतज्वर दुःसाध्य है अर्थात् प्राकृत ज्वर सुखसाध्य है और वातजन्य प्राकृत ज्वर यह भी दुःसाध्य है और रोगोंमें प्राकृतत्व दुःसाध्य है परन्तु ज्वरमें व्याधिस्वभाव करके सुखसाध्यत्व कहा है ॥ प्राकृतज्वरोंकी चिकित्साके निमित्त उत्पत्तिक्रम कहते हैं- वर्षासु मारुतो दुष्टः पित्तश्लेष्मान्वितो ज्वरम् । कुर्याच्च पित्तं शरदि तस्य चानुबलः कफः ॥ ५२ ॥ तत्प्रकृत्या विसर्गाच्च तत्र नानशनाद्भयम् । कफो वसन्ते तमपि वातपित्तं भवेदनु ॥ ५३ ॥ ग्रीष्मऋतुसे संचित हुआ वायु वर्षाकालमें कुपित हो पित्त कफयुक्त हो ज्वरको प्रगट करे है उसी प्रकार वर्षाकालमें संचित हुआ पित्त शरदृतुमें दुष्ट होकर ज्वरको उत्पन्न करे है उसको कफका अनुबन्ध होता है । उस ज्वरमें कफ पित्तके स्वभाव करके और विसर्ग काल करके लंघन करनेसे भय नहीं होय । तैसे ही १ यदुक्तम्-प्राकृतः सुखसाध्यस्तु वसंतशरदुद्भवः॥२ ज्वरे तुल्यर्तुदोषत्वं प्रमेहे तुल्यदूष्यता । रक्तगुल्मे पुरातनत्वं सुखसाध्यस्य लक्षणम् ॥ ३ अनुबलं यथा-स्वतंत्रस्य कस्यचिद्राज्ञो गजरथ- तुरगपुरुषादिबलवतो वैरिभिः सह युध्यमानस्य पश्चादन्यबलं तच्छक्तेरनुबलोपबृंहणार्थमागच्छति एवं स्वतन्त्रस्य पित्तस्य ज्वरं कुर्वतो बलोपबृंहणं शरदि कफः करोति, तयोः पित्तश्लेष्मणोः प्रकृत्या स्वभावेन तत्कृतयोर्ज्वरयोरनशनाल्लंघननाद्भयं न भवतीति ॥ वर्षा शरद और हेमंत ये विसर्गकाल हैं इनमें चन्द्रमाका बल रहे है इनमें प्राणोंका बल बढे है। और शिशिर वसन्त ग्रीष्म ये आदानकाल हैं इनमें सूर्य्यका बल अधिक होता है इसीसे प्राणोंका बलक्षीण होता है ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA