माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( ४६ ) ज्वरमुक्तिके लक्षण । स्वेदो लघुत्वं शिरसः कण्डूः पाको मुखस्य च । क्षवथुश्चान्नकांक्षा च ज्वरमुक्तस्य लक्षणम् ॥ ७३ ॥ इति ज्वरनिदानम् ॥ पसीने आवें, देह हलका हो, मस्तकमें खुजली चले, मुखका पाक अर्थात् होठोंमें पपडी पडजाय, छींक आवे, भोजन करनेकी इच्छा हो ये लक्षण ज्वरमुक्तके हैं ॥ प्रसंगवशाज्ज्वरमुक्तलक्षणं ग्रन्थान्तरे- देहो लघुर्व्यपगतक्लममोहतापः पाको मुखे करणसौष्ठवमव्यथत्वम् । स्वेदः क्षवः प्रकृतियोगिमनोऽन्नलिप्सा कण्डूश्च मूर्ध्नि विगतज्वरलक्षणानि ॥ १ ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषा- टीकायां ज्वरनिदानं समाप्तम् ॥ इंग्रेजी मतानुसार ज्वर निदान । ज्वरको इंग्रेजीमें ( Fever ) फीवर कहते हैं उसकी उत्पत्ति । १--शरदी । शरदी पडनेसे मनुष्यका सब देह रोमांचबद्ध होजाय तब पसीनेका निकलना रुकजाय इस हेतुसे देहका जो अवगुण सो देहके बाहर नहीं निकले इसीसे देह हलका नहीं होय और वही देहका अवगुण ज्वररोगको प्रगट करता है । इस ज्वरको सामान्य ज्वर कहते हैं। अथवा देह अतिगरमीसे पीडित होय उस समय किसी कारणसे शीतल करे तो शरदी होती है अथवा किसी अतिपरिश्रम करनेसे मनुष्यके देहसे पसीने निकलें उस समय हवामें बैठे अथवा हवामें शयन करनेसे शरदी होती है अथवा रातमें मैदानमें सोनेसे अथवा रातमें शीतलपवनके लगनेसे पसीना नहीं निकले इस हेतुसे शरदी होय अथवा गीला कपडा ओढकर बैठनेसे वा सोनेसे शरदी होय है इन कारणोंसे शरदी होय वह शरदी अनेक प्रकारके ज्वरोंकी उत्पत्ति करे है ॥