माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( ५५ ) जो पुरुष कटु, अजीर्ण, मिरच आदि तीखी, दाहकारक (वंश, करीलकी कोंपल) आदि, खट्टी, खारी (ओंगा आदिका खार) आदिशब्दसे नोनका गरम पदार्थ इन कारणोंसे कुपित हुआ जो पित्त सो जठराग्निको ऐसे बुझा देता है जैसे तप्तजल अग्निको शांत कर देता है और पित्तकी ग्रहणीसे पीली कान्तिवाला पुरुष कच्चा तथा नीले पीले रंगके मलको निकाले तथा धूमयुक्त डकार आवे, हृदय और कंठमें दाह होवे, अरुचि और प्यास करके पीडित होवे, ये पित्तकी संग्रहणीके लक्षण हैं ॥ कफग्रहणीकी उत्पत्ति । गुर्वातिस्निग्धशीतादिभोजनादतिभोजनात् । भुक्तमात्रस्य च स्वप्नाद्धन्त्यग्निं कुपितः कफः ॥ १३ ॥ तस्यान्नं पच्यते दुःखं हृल्लासच्छर्द्यरोचकाः । आस्योपदेहमाधुर्यकासष्ठीवनपीनसाः ॥ १४ ॥ हृदयं मन्यते स्त्यानमुदरं स्तिमितं गुरु । दुष्टो मधुर उद्गारः सदनं स्त्रीष्वहर्षणम् ॥ १५ ॥ भिन्नामश्लेष्म- संसृष्टगुरुवर्चःप्रवर्तनम् । अकृशस्यापि दौर्बल्यमालस्यं च कफात्मके ॥ १६ ॥ भारी, अत्यन्त चिकना, शीतल आदि पदार्थके खानेसे अतिभोजनसे तथा भोजन करके दिनमें सोनेसे इन कारणोंसे कुपित हुआ कफ जठराग्निको शांत करे तब इसका खाया अन्न कष्टसे पचे, हृदयमें पीडा हो, वमन, अरुचि, मुख कफसे लिपासा तथा मुखका मीठा रहना, खांसी, कफ थूके, पीनस (जुखाम) हो, हृदय पानीसे भरासदृश हो, पेट भारी और जड हो, दुष्ट और मीठी डकार आवे, अग्नि शांत हो स्त्रीरमणमें अरुचि, पतला आम कफ मिला और भारी ऐसा मल निकले, बल विना शरीर पुष्ट दीखे, आलस्य बहुत आवे ये कफकी ग्रहणीके लक्षण हैं ॥ त्रिदोषकी ग्रहणीके लक्षण । पृथग्वातादिनिर्दिष्टहेतुलिङ्गसमागमे । त्रिदोषं लक्षयेद्देवं तेषां वक्ष्यामि भेषजम् ॥ १७ ॥ वातादि तीनों दोषोंके जो लक्षण कह आये हैं वे सब जिसमें मिलते होंयँ उसको त्रिदोषकी ग्रहणी जानिये “तेषां भेषजम्” यह पद केवल पादपूरणार्थ लिखा है ॥ (संग्रहणी लक्षण । अन्नकूजनमालस्यं दौर्बल्यं सदनं तथा । द्रवं शीतं घनं स्निग्धं सकटीवेदनं शकृत् ॥ १ ॥ आमं बहु सपैच्छिल्यं CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA