भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 77

भाषाटीकासमेत । ( ५९ ) त्रिदोषकी बवासीरके कारण । सर्वो हेतुस्त्रिदोषाणां सहजैर्लक्षणैः समम् ॥ ९ ॥ पृथक् वातादि बवासीरके जो कारण कहे हैं वे सर्व त्रिदोषकी बवासीरके कारण हैं, और जो सहज अर्शके अर्थात् सहज बवासीरके लक्षण सो भी इसके लक्षण जानने ॥ वातकी बवासीरके लक्षण । गुदाङ्कुरा बह्वनिलाः शुष्काश्चिमिचिमान्विताः । म्लानाः श्यावारुणाः स्तब्धा विशदाः परुषाः खराः ॥ १० ॥ मिथो विसदृशा वक्रास्तीक्ष्णा विस्फुटिताननाः । बिंबिकर्कन्धु- खर्जूरकार्पासीफलसंनिभाः ॥ ११ ॥ केचित्कदम्बपुष्पाभाः केचित्सिद्धार्थकोपमाः । शिरःपार्श्वासकट्यूरूंवक्षणाभ्यधिक- व्यथाः ॥ १२ ॥ क्षवथूद्गारविष्टंभहृद्ग्रहारोचकप्रदाः । कास- श्वासाग्निवैषम्यकर्णनादभ्रमावहाः ॥ १३ ॥ तैरात्तो ग्रथितं स्तोकं सशब्दं सप्रवाहिकम् । रुक्फेनापिच्छानुगतं विबद्ध- मुपवेश्यते ॥ १४ ॥ कृष्णत्वङ्नखविण्मूत्रनेत्रवक्त्रश्च जायते । गुल्मप्लीहोदराष्ठीलासंभवस्तत एव च ॥ १५ ॥ वाताधिक्यसे गुदाके अंकुर सूखे (स्रावरहित) चिमचिम पीडायुक्त मुरझाये हुए, काले, लाल, टेढे, विशद, कर्कश, खरदरे, एकसे न होय, बांके, तीखे, फटे मुखके, कन्दूरी, बेर, खजूर, कपासके फलसदृश होय, कोई कदंबके फूल समान हों, कोई सरसोंके सदृश हों, शिर, पसवाडे, कन्धा, कमर, जांघ, पेडू इनमें अधिक पीडा हो, छींक, डकार, दस्तका न होना, हृदय पकडासा मालूम हो, अरुचि, खांसी, श्वास, अग्निका विषम होना अर्थात् कभी अन्न पचे, कभी नहीं पचे, कानोंमें शब्द होय, भ्रम होय उस बवासीरसे पीडित मनुष्यके पत्थरके समान, थोडा शब्दयुक्त १. अथ सहजाशोलक्षणम् । यथाच सुश्रुतः- "दुर्दर्शनानि परुषारुणपांडूनि दारुणान्त- मुखानि तैरुपद्रुतः कृशोऽल्पभुक् शिरासततगात्रोऽल्पप्रजः क्षीणरेताः क्षामस्वरः क्रोधनोऽल्पामि- र्घ्राणशिरोऽक्षिश्रवणरोगवान् सततमन्त्रकूजनाटोपहृदयोपलेपारोचकप्रभृतिभिः पीड्यते ।" दुःखसे देखने योग्य (बहुत छोटे होनेसे) अथवा भयंकर दर्शन और खरदरे लाल पीले वर्णवाले कठिन और भीतर मुखवाले मस्सों उपद्रवसे युक्त मनुष्य दुबला थोडा भोजन करने- वाला शिराओंसे व्याप्त शरीर (सब शरीरपर दीखें) अल्प सन्तान, क्षीण शुक्र, बैठी हुई आवाज, क्रोध, मन्दाग्नि, नाक शिर नेत्र कानोंके रोगवाला, निरन्तर आंतोंमें शब्द, अफरा, हृदयका भारीपन, अरुचि आदिसे पीडित होता है ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA