भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 80, कुल 404 में से

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( ६२ ) माधवनिदान । इच्छा इत्यादि दुःख तिनसे पीडित होय, हीनवर्ण, बल उत्साह पराक्रमका नाश होय, सम्पूर्ण इंद्रियोंका व्याकुल होना, उसका काला, कठिन और रूखा ऐसा मल होय, अपानवायु करे नहीं, ये लक्षण रुधिरकी बवासीरके जानने चाहिये ॥ अब इसी रक्तार्शनिदानके वातादिभेदकरके लक्षण कहते हैं— तनु चारुणवर्णं च फेनिलं चासृगर्र्शसाम् । कट्यूरुगुदशूलं च दौर्बल्यं यदि चाधिकम् ॥ तत्रानुबन्धो वातस्य हेतुर्यदि च रूक्षणम् ॥ २८ ॥ बवासीरमें रुधिर थोडा, अरुणवर्ण और झागसंयुक्त निकले और कमर जाँघ और गुदा इनमें दर्द होवे । यदि दुर्बलता विशेष होजावे और उसमें कोई रूक्ष हेतु पहुँचा होवे तो इस रक्तार्शको वातका सम्बन्ध है ऐसे जानना ॥ कफसम्बन्धके लक्षण । शिथिलं श्वेतपीतं च विट् स्निग्धं गुरु शीतलम् । यच्चार्शसां घनं चासृक्तन्तुमत्पाण्डु पिच्छिलम् ॥ २९ ॥ गुदं सपिच्छं स्तिमितं गुरु स्निग्धं च कारणम् । श्लेष्मानुबन्धो विज्ञेयस्तत्र रक्तार्शसां बुधैः ॥ ३० ॥ जिसमेंसे शिथिल, सफेद, पीला, चिकना, भारी और शीतल ऐसा दस्त होय और जिसका रुधिर गाढा तन्तुयुक्त पीला तथा बबूलेयुक्त निकले और गुदा बबूलयुक्त, गीला होवे और भारी चिकनी ऐसे कोई कारण होवे तो उस रक्तार्शको कफका सम्बन्ध जानना । शंका-क्यों जी ! पित्तके अनुबन्धकी बवासीर क्यों नहीं कही ? उत्तर-रक्तके और पित्तके प्रायः करके समान लक्षण होनेसे नहीं कहे, क्योंकि पहले २४ वें श्लोकमें कहि आये हैं कि "पित्ताकृतिसमन्विताः" इति ॥ बवासीरका पूर्वरूप । विष्टम्भोऽन्नस्य दौर्बल्यं कुक्षेराटोप एव च । कार्श्यमुद्गार- बाहुल्यं सक्थिसादोऽल्पविट्कता ॥ ३१ ॥ ग्रहणीदोषपाण्ड्वार्ते- राशङ्का चोदरस्य च। पूर्वरूपाणि निर्दिष्टान्यर्शसामभिवृद्धये ॥३२ अन्नका परिपाक अच्छी तरह हो नहीं, अन्न कूखमें रहे, देहमें दुर्बलता हो, कूखमें अफारा हो, अग्नि मन्द हो जावे, डकार बहुत आवै, जंघामें पीडा, थोडा दस्त उतरे, संग्रहणी और पाण्डुरोगकी भ्रांति होना, क्योंकि, उनके लक्षण मिलते हैं और उदर- रोगकी शंका होना ये लक्षण होवें तब जानना कि पुरुषके बवासीर रोग होवेगा ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA