माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ८० ) माधवनिदान । असाध्य है। अथवा-जिस मनुष्यका बँधाहुआ मल थोडा हरे रंगका कफमिश्रित उतरे सो भी असाध्य है । अथवा-जो पुरुष दीन कहिये ग्लानियुक्त हो और जिसकी देहका श्वेत वर्ण हो और वमन, मूर्च्छा, प्यास इनसे पीडित होवे सो पांडु- रोगी नष्ट होवे । अथवा-रुधिरक्षय होनेसे जो पांडुरोग श्वेतत्वको प्राप्त होय सो भी असाध्य है । जिसके दांत, नख और नेत्र पीले होंय वह रोगी असाध्य है । जिसको सब पदार्थ पीलेही पीले दीखें वह रोगी मरे । हाथ, पैर, शिर, इनमें सूजन हो और जिसका मध्य पतला होय ऐसा पांडुरोगी असाध्य है, इससे विपरीत साध्य है। जिस रोगीके देहके मध्यमें सूजन हो और हाथ, पग, शिर ये सूखजायँ तथा गुदा, लिङ्ग इनमें सूजन होय तथा मरेके समान होगया होय ऐसे पांडुरोगीको जिस वैद्यको यशकी इच्छा हो सो त्याग दे । इसी प्रकार अतिसार और ज्वर इनसे पीडित रोगीको वैद्य त्याग देवे परन्तु इस अन्तके श्लोकमें जो “ पाण्डुकिनं ” यह पाठ है। इस जगह पालकिनं ऐसा पाठ कोई आचार्य मानते हैं सो ठीक है क्योंकि ऐसा पढनेसे पांडुरोगकी अवस्था अर्थात् पांडुरोगका भेद जो पालकी है उसके भी लक्षण इस पाठसे आगये । सो सुश्रुतमें लिखा है, इसीका आश्रय लेकर किसी अन्यने भी लिखा है। यथा- अन्ते शूनः कृशो मध्ये त्वथवा गुदशेफसि ॥ शूनो ज्वरातिसाराद्यैर्मृतकल्पस्तु पालकी ॥ १७ ॥ जिस मनुष्यके हाथ पैरोंके ऊपर सूजन और देहका मध्य कृश होगया अथवा गुदा लिंगपर सूजन हो तथा ज्वर अतिसारके मुर्देके समान हो ये लक्षण पालकी रोगके हैं । पांडुरोगका भेद कामला है ॥ कामलाके लक्षण । पाण्डुरोगी तु योऽत्यर्थं पित्तलानि निषेवते । तस्य पित्तमसृङ्मांसं दग्ध्वा रोगाय कल्पते ॥ १८ ॥ हारिद्रनेत्रः स भृशं हारिद्रत्वङ्नखाननः । रक्तपित्तशकृन्मूत्रो भेकवर्णो हतेन्द्रियः ॥ १९ ॥ दाहाविपाकदौर्बल्यसदनारुचिकर्षितः । कामला बहुपित्तेषा कोष्ठशाखाश्रया मता ॥ २० ॥ १ सकामलापालकिपाण्डुरोगः कुम्भाह्वयो लाघविकोऽलसाख्यः । इति ॥