महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1001, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंतदनन्तर दुर्योधन, कर्ण, महाबली युयुत्सु, दुःशासन, विकर्ण, जलसंध तथा सुलोचन—ये और दूसरे भी बहुत-से महापराक्रमी नरश्रेष्ठ क्षत्रियशिरोमणि राजकुमार 'पहले मैं युद्ध करूँगा, पहले मैं युद्ध करूँगा' इस प्रकार कहते हुए पांचालदेशमें जा पहुँचे और वहाँके निवासियोंको मारते-पीटते हुए महाबली राजा द्रुपदकी राजधानीको भी रौंदने लगे ॥ ५—७ ॥
ततो वररथारूढाः कुमाराः सादिभिः सह ।
प्रविश्य नगरं सर्वे राजमार्गमुपाययुः ॥ ८ ॥
उत्तम रथोंपर बैठे हुए वे सभी राजकुमार घुड़सवारोंके साथ नगरमें घुसकर वहाँके राजपथपर चलने लगे ॥ ८ ॥
तस्मिन् काले तु पाञ्चालः श्रुत्वा दृष्ट्वा महद् बलम् ।
भ्रातृभिः सहितो राजंस्त्वरया निर्ययौ गृहात् ॥ ९ ॥
जनमेजय! उस समय पांचालराज द्रुपद कौरवोंका आक्रमण सुनकर और उनकी विशाल सेनाको अपनी आँखों देखकर बड़ी उतावलीके साथ भाइयोंसहित राजभवनसे बाहर निकले ॥ ९ ॥
ततस्तु कृतसंनाहा यज्ञसेनसहोदराः ।
शरवर्षाणि मुञ्चन्तः प्रणेदुः सर्व एव ते ॥ १० ॥
महाराज यज्ञसेन (द्रुपद) और उनके सब भाइयोंंने कवच धारण किये। फिर वे सभी लोग बाणोंकी बौछार करते हुए जोर-जोरसे गर्जना करने लगे ॥ १० ॥
ततो रथेन शुभ्रेण समासाद्य तु कौरवान् ।
यज्ञसेनः शरान् घोरान् ववर्ष युधि दुर्जयः ॥ ११ ॥
राजा द्रुपदको युद्धमें जीतना बहुत कठिन था। वे चमकीले रथपर सवार हो कौरवोंके सामने जा पहुँचे और भयानक बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ ११ ॥
वैशम्पायन उवाच
पूर्वमेव तु सम्मन्त्र्य पार्थो द्रोणमथाब्रवीत् ।
दर्पोद्रेकात् कुमाराणामाचार्यं द्विजसत्तमम् ॥ १२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! कौरवों तथा अन्य राजकुमारोंको अपने बल और पराक्रमका बड़ा घमंड था; इसलिये अर्जुनने पहले ही अच्छी तरह सलाह करके विप्रवर द्रोणाचार्यसे कहा— ॥ १२ ॥
एषां पराक्रमस्यान्ते वयं कुर्याम साहसम् ।
एतैरशक्यः पाञ्चालो ग्रहीतुं रणमूर्धनि ॥ १३ ॥
'गुरुदेव! इनके पराक्रम दिखानेके पश्चात् हमलोग युद्ध करेंगे। हमारा विश्वास है, ये लोग युद्धमें पांचालराजको बंदी नहीं बना सकते' ॥ १३ ॥