भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1003

(दुःशासनं च दशभिर्विकर्णं विंशकैः शरैः । शकुनिं विंशकैस्तीक्ष्णैर्दशभिर्मर्मभेदिभिः ॥ कर्णदुर्योधनौ चोभौ शरैः सर्वाङ्गसंधिषु । अष्टाविंशतिभिः सर्वैः पृथक् पृथगरिन्दमः ॥ सुबाहुं पञ्चभिर्विद्ध्वा तथान्यान् विविधैः शरैः । विव्याध सहसा भूयो ननाद बलवत्तरम् ॥ विनद्य कोपात् पाञ्चालः सर्वशस्त्रभृतां वरः । धनूंषि रथयन्त्रं च हयांश्चित्रध्वजानपि । चकर्त सर्वपाञ्चालाः प्रणेदुः सिंहसङ्घवत् ॥) ततस्तु नागराः सर्वे मुसलैर्यष्टिभिस्तदा । अभ्यवर्षन्त कौरव्यान् वर्षमाणा घना इव ॥ २३ ॥ उन्होंने दुःशासनको दस, विकर्णको बीस तथा शकुनिको अत्यन्त तीखे तीस मर्मभेदी बाण मारकर घायल कर दिया। तत्पश्चात् शत्रुदमन द्रुपदने कर्ण और दुर्योधनके सम्पूर्ण अंगोंकी संधियोंमें पृथक्-पृथक् अट्ठाईस बाण मारे। सुबाहुको पाँच बाणोंसे घायल करके अन्य योद्धाओंको भी अनेक प्रकारके सायकोंद्वारा सहसा बींध डाला और तब बड़े जोरसे सिंहनाद किया। इस प्रकार क्रोधपूर्वक गर्जना करके सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ पंचालराज द्रुपदने शत्रुओंके धनुष, रथ, घोड़े तथा रंग-बिरंगी ध्वजाओंको भी काट दिया। तत्पश्चात् सारे पांचाल सैनिक सिंह-समूहके समान गर्जना करने लगे। फिर तो उस नगरके सभी निवासी कौरवोंपर टूट पड़े और बरसनेवाले बादलोंकी भाँति उनपर मूसल एवं डंडोंकी वर्षा करने लगे ॥ २३ ॥ सबालवृद्धास्ते पौराः कौरवानभ्यायुस्तदा । श्रुत्वा सुतुमुलं युद्धं कौरवानेव भारत ॥ २४ ॥ द्रवन्ति स्म नदन्ति स्म क्रोशन्तः पाण्डवान् प्रति । (पाञ्चालशरभिन्नाङ्गो भयमासाद्य वै वृषः । कर्णो रथादवप्लुत्य पलायनपरोऽभवत् ॥) पाण्डवास्तु स्वनं श्रुत्वा आर्तानां लोमहर्षणम् ॥ २५ ॥ अभिवाद्य ततो द्रोणं रथानारुरुहुस्तदा । युधिष्ठिरं निवार्याशु मा युध्यस्वेति पाण्डवम् ॥ २६ ॥ उस समय बालकसे लेकर बूढ़ेतक सभी पुरवासी कौरवोंका सामना कर रहे थे। जनमेजय! गुप्तचरोंके मुखसे यह समाचार सुनकर कि वहाँ तुमुल युद्ध हो रहा है, कौरव वहाँ नहींके बराबर हो गये हैं, पंचालराज द्रुपदके बाणोंसे कर्णके सम्पूर्ण अंग क्षत-विक्षत हो गये, वह भयभीत हो रथसे कूदकर भाग चला है तथा कौरव-सैनिक चीखते-चिल्लाते और कराहते हुए हम पाण्डवोंकी ओर भागते आ रहे हैं; पाण्डवलोग पीड़ित सैनिकोंका