भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1005

भीमसेनकी गदासे मस्तक फट जानेके कारण वे पर्वतोंके समान विशालकाय गजराज लोहूके झरने बहाते हुए वज्रके आघातसे (पंख कटे हुए) पहाड़ोंकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ते थे। अर्जुनके बड़े भाई पाण्डुनन्दन भीमने हाथियों, घोड़ों एवं रथोंको धराशायी कर दिया। पैदलों तथा रथियोंका संहार कर डाला। जैसे ग्वाला वनमें डंडेसे पशुओंको हाँकता है, उसी प्रकार भीमसेन रथियों और हाथियोंको खदेड़ते हुए उनका पीछा करने लगे ।। ३२ —३४ १/२ ।।

वैशम्पायन उवाच

भारद्वाजप्रियं कर्तुमुद्यतः फाल्गुनस्तदा ।। ३५ ।।
पार्षतं शरजालेन क्षिपन्नागात् स पाण्डवः ।
हयौघांश्च रथौघांश्च गजौघांश्च समन्ततः ।। ३६ ।।
पातयन् समरे राजन् युगान्ताग्निरिव ज्वलन् ।

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! उस समय द्रोणाचार्यका प्रिय करनेके लिये उद्यत हुए पाण्डुनन्दन अर्जुन द्रुपदपर बाणसमूहोंकी वर्षा करते हुए उनपर चढ़ आये। वे रणभूमिमें घोड़ों, रथों और हाथियोंके झुंडोंका सब ओरसे संहार करते हुए प्रलयकालीन अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे ।। ३५-३६ १/२ ।।

ततस्ते हन्यमाना वै पाञ्चालाः सृञ्जयास्तथा ।। ३७ ।।
शरैर्नानाविधैस्तूर्णं पार्थं संछाद्य सर्वशः ।
सिंहनादं मुखैः कृत्वा समयुध्यन्त पाण्डवम् ।। ३८ ।।

उनके बाणोंसे घायल हुए पांचाल और सृंजय वीरोंने तुरंत ही नाना प्रकारके बाणोंकी वर्षा करके अर्जुनको सब ओरसे ढक दिया और मुखसे सिंहनाद करते हुए उनसे लोहा लेना आरम्भ किया ।। ३७-३८ ।।

तद् युद्धमभवद् घोरं सुमहाद्भुतदर्शनम् ।
सिंहनादस्वनं श्रुत्वा नामृष्यत् पाकशासनिः ।। ३९ ।।

वह युद्ध अत्यन्त भयानक और देखनेमें बड़ा ही अद्भुत था। शत्रुओंका सिंहनाद सुनकर इन्द्रकुमार अर्जुन उसे सहन न कर सके ।। ३९ ।।

ततः किरीटी सहसा पाञ्चालान् समरेऽद्रवत् ।
छादयन्निषुजालेन महता मोहयन्निव ।। ४० ।।

उस युद्धमें किरीटधारी पार्थने बाणोंका बड़ा भारी जाल-सा बिछाकर पांचालोंको आच्छादित और मोहित-सा करते हुए उनपर सहसा आक्रमण किया ।। ४० ।।

शीघ्रमभ्यस्यतो बाणान् संदधानस्य चानिशम् ।
नान्तरं ददृशे किंचित् कौन्तेयस्य यशस्विनः ।। ४१ ।।