महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1007, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंततः शरशतैः पार्थं पाञ्चालः शीघ्रमार्दयत् । पार्थस्तु शरवर्षेण छाद्यमानो महारथः ॥ ४८ ॥ वेगं चक्रे महावेगो धनुर्ज्यामवमृज्य च । ततः सत्यजितश्चापं छित्त्वा राजानमभ्ययात् ॥ ४९ ॥ फिर पांचाल वीर सत्यजित्ने भी शीघ्र ही सौ बाण मारकर अर्जुनको पीड़ित कर दिया। उनके बाणोंकी वर्षासे आच्छादित होकर महान् वेगशाली महारथी अर्जुनने धनुषकी प्रत्यंचाको झाड़-पोंछकर बड़े वेगसे बाण छोड़ना आरम्भ किया और सत्यजित्के धनुषको काटकर वे राजा द्रुपदपर चढ़ आये ॥ ४८-४९ ॥
अथान्यद् धनुरादाय सत्यजिद् वेगवत्तरम् । साश्वं ससूतं सरथं पार्थं विव्याध सत्वरः ॥ ५० ॥ तब सत्यजित्ने दूसरा अत्यन्त वेगशाली धनुष लेकर तुरंत ही घोड़े, सारथि एवं रथसहित अर्जुनको बींध डाला ॥ ५० ॥
स तं न ममृषे पार्थः पाञ्चालेनार्दितो युधि । ततस्तस्य विनाशार्थं सत्वरं व्यसृजच्छरान् ॥ ५१ ॥ युद्धमें पांचाल वीर सत्यजित्से पीड़ित हो अर्जुन उनके पराक्रमको न सह सके और उनके विनाशके लिये उन्होंने शीघ्र ही बाणोंकी झड़ी लगा दी ॥ ५१ ॥
हयान् ध्वजं धनुर्मुष्टिमुभौ तौ पार्ष्णिसारथी । स तथा भिद्यमानेषु कार्मुकेषु पुनः पुनः ॥ ५२ ॥ हयेषु विनियुक्तेषु विमुखोऽभवदाहवे । स सत्यजितमालोक्य तथा विमुखमाहवे ॥ ५३ ॥ वेगेन महता राजन्नभ्यवर्षत पाण्डवम् । तदा चक्रे महद् युद्धमर्जुनो जयतां वरः ॥ ५४ ॥ सत्यजित्के घोड़े, ध्वजा, धनुष, मुट्ठी तथा पार्श्वरक्षक एवं सारथि दोनोंको अर्जुनने क्षत-विक्षत कर दिया। इस प्रकार बार-बार धनुषके छिन्न-भिन्न होने और घोड़ोंके मारे जानेपर सत्यजित् समर-भूमिसे भाग गये। राजन्! उन्हें इस तरह युद्धसे विमुख हुआ देख पांचालनरेश द्रुपदने पाण्डुनन्दन अर्जुनपर बड़े वेगसे बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ की। तब विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ अर्जुनने उनसे बड़ा भारी युद्ध प्रारम्भ किया ॥ ५२—५४ ॥
तस्य पार्थो धनुश्छित्त्वा ध्वजं चोर्व्यामपातयत् । पञ्चभिस्तस्य विव्याध हयान् सूतं च सायकैः ॥ ५५ ॥ उन्होंने पंचालराजका धनुष काटकर उनकी ध्वजाको भी धरतीपर काट गिराया। फिर पाँच बाणोंसे उनके घोड़ों और सारथिको घायल कर दिया ॥ ५५ ॥
तत उत्सृज्य तच्चापमाददानं शरावरम् । खड्गमुद्धृत्य कौन्तेयः सिंहनादमथाकरोत् ॥ ५६ ॥