महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1010, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनाश्चर्यमिदं ब्रह्मन् विक्रान्तेषु महात्मसु ।
प्रीये त्वयाहं त्वत्तश्च प्रीतिमिच्छामि शाश्वतीम् ॥ ७१ ॥
द्रुपदने कहा— ब्रह्मन्! आप-जैसे पराक्रमी महात्माओंमें ऐसी उदारताका होना आश्चर्यकी बात नहीं है। मैं आपसे बहुत प्रसन्न हूँ और आपके साथ सदा बनी रहनेवाली मैत्री एवं प्रेम चाहता हूँ ॥ ७१ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तः स तं द्रोणो मोक्षयामास भारत ।
सत्कृत्य चैनं प्रीतात्मा राज्यार्धं प्रत्यपादयत् ॥ ७२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— भारत! द्रुपदके यों कहनेपर द्रोणाचार्यने उन्हें छोड़ दिया और प्रसन्नचित्त हो उनका आदर-सत्कार करके उन्हें आधा राज्य दे दिया ॥ ७२ ॥
माकन्दीमथ गङ्गायास्तीरे जनपदायताम् ।
सोऽध्यावसद् दीनमनाः काम्पिल्यं च पुरोत्तमम् ॥ ७३ ॥
दक्षिणांश्चापि पञ्चालान् यावच्चर्मण्वती नदी ।
द्रोणेन चैवं द्रुपदः परिभूयाथ पालितः ॥ ७४ ॥
तदनन्तर राजा द्रुपद दीनतापूर्ण हृदयसे गङ्गा-तटवर्ती अनेक जनपदोंसे युक्त माकन्दीपुरीमें तथा नगरोंमें श्रेष्ठ काम्पिल्य नगरमें निवास एवं चर्मण्वती नदीके दक्षिणतटवर्ती पंचालदेशका शासन करने लगे। इस प्रकार द्रोणाचार्यने द्रुपदको परास्त करके पुनः उनकी रक्षा की ॥ ७३-७४ ॥
क्षात्रेण च बलेनास्य नापश्यत् स पराजयम् ।
हीनं विदित्वा चात्मानं ब्राह्मेण स बलेन तु ॥ ७५ ॥
पुत्रजन्म परीप्सन् वै पृथिवीमन्वसंचरत् ।
अहिच्छत्रं च विषयं द्रोणः समभिपद्यत ॥ ७६ ॥
द्रुपदको अपने क्षात्रबलके द्वारा द्रोणाचार्यकी पराजय होती नहीं दिखायी दी। वे अपनेको ब्राह्मण-बलसे हीन जानकर (द्रोणाचार्यको पराजित करनेके लिये) शक्तिशाली पुत्र प्राप्त करनेकी इच्छासे पृथ्वीपर विचरने लगे। इधर द्रोणाचार्यने (उत्तर-पांचालवर्ती) अहिच्छत्र नामक राज्यको अपने अधिकारमें कर लिया ॥ ७५-७६ ॥
एवं राजन्नहिच्छत्रा पुरी जनपदायूता ।
युधि निर्जित्य पार्थेन द्रोणाय प्रतिपादिता ॥ ७७ ॥
राजन्! इस प्रकार अनेक जनपदोंसे सम्पन्न अहिच्छत्रा नामवाली नगरीको युद्धमें जीतकर अर्जुनने द्रोणाचार्यको गुरु-दक्षिणामें दे दिया ॥ ७७ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि द्रुपदशासने
सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३७ ॥