महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधृतराष्ट्रने पूछा— कणिक! साम, दान, भेद अथवा दण्डके द्वारा शत्रुका नाश कैसे किया जा सकता है, यह मुझे यथार्थरूपसे बताइये ।। २४ १/२ ।।
कणिक उवाच
शृणु राजन् यथावृत्तं वने निवसतः पुरा ।। २५ ।। जम्बुकस्य महाराज नीतिशास्त्रार्थदर्शिनः । कणिकने कहा— महाराज! इस विषयमें नीतिशास्त्रके तत्त्वको जाननेवाले एक वनवासी गीदड़का प्राचीन वृत्तान्त सुनाता हूँ, सुनिये ।। २५ १/२ ।। अथ कश्चित् कृतप्रज्ञः शृगालः स्वार्थपण्डितः ।। २६ ।। सखिभिर्न्यवसत् सार्धं व्याघ्राखुवृकबभ्रुभिः । तेऽपश्यन् विपिने तस्मिन् बलिनं मृगयूथपम् ।। २७ ।। अशक्ता ग्रहणे तस्य ततो मन्त्रममन्त्रयन् । एक वनमें कोई बड़ा बुद्धिमान् और स्वार्थ साधनेमें कुशल गीदड़ अपने चार मित्रों— बाघ, चूहा, भेड़िया और नेवलेके साथ निवास करता था। एक दिन उन सबने हरिणोंके एक सरदारको देखा, जो बड़ा बलवान् था। वे सब उसे पकड़नेमें सफल न हो सके, अतः सबने मिलकर यह सलाह की ।। २६-२७ १/२ ।।