महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1027, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंउद्यानेषु विहारेषु देवतायतनेषु च । पानागारेषु रथ्यासु सर्वतीर्थेषु चाप्यथ ॥ ६४ ॥ चत्वरेषु च कूपेषु पर्वतेषु वनेषु च । समवायेषु सर्वेषु सरित्सु च विचारयेत् ॥ ६५ ॥ उद्यान, घूमने-फिरनेके स्थान, देवालय, मद्यपानके अड्डे, गली या सड़क, सम्पूर्ण तीर्थस्थान, चौराहे, कुएँ, पर्वत, वन, नदी तथा जहाँ मनुष्योंकी भीड़ इकट्ठी होती हो, उन सभी स्थानोंमें अपने गुप्तचरोंको घुमाता रहे ॥ ६४-६५ ॥
वाचा भृशं विनीतः स्याद् हृदयेन तथा क्षुरः । स्मितपूर्वाभिभाषी स्यात् सृष्टो रौद्राय कर्मणे ॥ ६६ ॥ राजा बातचीतमें अत्यन्त विनयशील हो, परंतु हृदय छूरेके समान तीखा बनाये रखे। अत्यन्त भयानक कर्म करनेके लिये उद्यत हो तो भी मुसकराकर ही वार्तालाप करे ॥ ६६ ॥
अञ्जलिः शपथः सान्त्वं शिरसा पादवन्दनम् । आशाकरणमित्येवं कर्तव्यं भूतिमिच्छता ॥ ६७ ॥ अवसर देखकर हाथ जोड़ना, शपथ खाना, आश्वासन देना, पैरोंपर मस्तक रखकर प्रणाम करना और आशा बँधाना—ये सब ऐश्वर्य-प्राप्तिकी इच्छावाले राजाके कर्तव्य हैं ॥ ६७ ॥
सुपुष्पितः स्यादफलः फलवान् स्याद् दुरारुहः । आमः स्यात् पक्वसंकाशो न च जीर्येत कर्हिचित् ॥ ६८ ॥ नीतिज्ञ राजा ऐसे वृक्षके समान रहे, जिसमें फूल तो खूब लगे हों परंतु फल न हों (वह बातोंसे लोगोंको फलकी आशा दिलाये, उसकी पूर्ति न करे)। फल लगनेपर भी उसपर चढ़ना अत्यन्त कठिन हो (लोगोंकी स्वार्थसिद्धिमें वह विघ्न डाले या विलम्ब करे)। वह रहे तो कच्चा, पर दीखे पकेके समान (अर्थात् स्वार्थ-साधकोंकी दुराशाको पूर्ण न होने दे)। कभी स्वयं जीर्ण न हो (तात्पर्य यह कि अपना धन खर्च करके शत्रुओंका पोषण करते हुए अपने-आपको निर्धन न बना दे) ॥ ६८ ॥
त्रिवर्गे त्रिविधा पीडा ह्यनुबन्धस्तथैव च । अनुबन्धाः शुभा ज्ञेयाः पीडास्तु परिवर्जयेत् ॥ ६९ ॥ धर्म, अर्थ और काम—इन त्रिविध पुरुषार्थोंके सेवनमें तीन प्रकारकी बाधा—अड़चन उपस्थित होती है*। उसी प्रकार उनके तीन ही प्रकारके फल होते हैं। (धर्मका फल है अर्थ एवं काम अर्थात् भोगकी प्राप्ति, अर्थका फल है धर्मका सेवन एवं भोगकी प्राप्ति और काम अर्थात् भोगका फल है—इन्द्रियतृप्ति।) इन (तीनों प्रकारके) फलोंको शुभ (वरणीय) जानना चाहिये; परंतु (उक्त तीनों प्रकारकी) बाधाओंसे यत्नपूर्वक बचना चाहिये। (त्रिविध