भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1029

आकारमभिरक्षेत चारेणाप्यनुपालितः ॥ ७६ ॥
राजाको चाहिये कि वह दूसरोंके दोष प्रकाशित न करके अपनी गुप्त मन्त्रणाको सदा छिपाये रखनेकी चेष्टा करे। दूसरोंके गुप्तचरोंसे तो अपने आकारतकको (क्रोध और हर्ष आदिको सूचित करनेवाली चेष्टातकको) गुप्त रखे; परंतु अपने गुप्तचरसे भी सदा अपनी गुप्त मन्त्रणाकी रक्षा करे ॥ ७६ ॥

नाच्छित्त्वा परमर्माणि नाकृत्वा कर्म दारुणम् ।
नाहत्वा मत्स्यघातीव प्राप्नोति महतीं श्रियम् ॥ ७७ ॥
राजा मछलीमारोंकी भाँति दूसरोंके मर्म विदीर्ण किये बिना, अत्यन्त क्रूर कर्म किये बिना तथा बहुतोंके प्राण लिये बिना बड़ी भारी सम्पत्ति नहीं पाता ॥ ७७ ॥

कर्शितं व्याधितं क्लिन्नमपानीयमघासकम् ।
परिविश्वस्तमन्दं च प्रहर्तव्यमरेर्बलम् ॥ ७८ ॥
जब शत्रु्की सेना दुर्बल, रोगग्रस्त, जल या कीचड़में फँसी, भूख-प्याससे पीड़ित और सब ओरसे विश्वस्त होकर निश्चेष्ट पड़ी हो, उस समय उसपर प्रहार करना चाहिये ॥ ७८ ॥

नार्थिकोऽर्थिनमभ्येति कृतार्थे नास्ति संगतम् ।
तस्मात् सर्वाणि साध्यानि सावशेषाणि कारयेत् ॥ ७९ ॥
धनवान् मनुष्य किसी धनीके पास नहीं जाता। जिसके सब काम पूरे हो चुके हैं, वह किसीके साथ मैत्री निभानेकी चेष्टा नहीं करता; अतः अपनेद्वारा सिद्ध होनेवाले दूसरोंके कार्य ही अधूरे रख दे (जिससे अपने कार्यके लिये उनका आना-जाना बना रहे) ॥ ७९ ॥

संग्रहे विग्रहे चैव यत्नः कार्योंऽनसूयता ।
उत्साहश्चापि यत्नेन कर्तव्यो भूतिमिच्छता ॥ ८० ॥
ऐश्वर्यकी इच्छा रखनेवाले राजाको दूसरोंके दोष न बताकर सदा आवश्यक सामग्रीके संग्रह और शत्रुओंके साथ विग्रह (युद्ध) करनेका प्रयत्न करते रहना चाहिये; साथ ही यत्नपूर्वक अपने उत्साहको बनाये रखना चाहिये ॥ ८० ॥

नास्य कृत्यानि बुध्येरन् मित्राणि रिपवस्तथा ।
आरब्धान्येव पश्येरन् सुपर्यवसितान्यपि ॥ ८१ ॥
मित्र और शत्रु—किसीको भी यह पता न चले कि राजा कब क्या करना चाहता है। कार्यके आरम्भ अथवा समाप्त हो जानेपर ही (सब) लोग उसे देखें ॥ ८१ ॥

भीतवत् संविधातव्यं यावद् भयमानागतम् ।
आगतं तु भयं दृष्ट्वा प्रहर्तव्यमभीतवत् ॥ ८२ ॥
जबतक अपने ऊपर भय आया न हो, तबतक डरे हुएकी भाँति उसको टालनेका प्रयत्न करना चाहिये; परंतु जब भयको सामने आया देखे, तब निडर होकर शत्रुपर प्रहार करना चाहिये ॥ ८२ ॥

दण्डेनोपनतं शत्रुमनुगृह्णाति यो नरः ।