भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1038

उसके बाद पुनः उसीकी पुत्रपरम्परामें दूसरे-दूसरे लोग इसके अधिकारी होते जायँगे ॥ ३५ ॥

ते वयं राजवंशेन हीनाः सह सुतैरपि । अवज्ञाता भविष्यामो लोकस्य जगतीपते ॥ ३६ ॥ महाराज! ऐसी दशामें हमलोग अपने पुत्रोंसहित राजपरम्परासे वंचित होनेके कारण सब लोगोंकी अव-हेलनाके पात्र बन जायँगे ॥ ३६ ॥ सततं निरयं प्राप्ताः परपिण्डोपजीविनः । न भवेम यथा राजंस्तथा नीतिर्विधीयताम् ॥ ३७ ॥ राजन्! आप कोई ऐसी नीति काममें लाइये, जिससे हमें दूसरोंके दिये हुए अन्नसे गुजारा करके सदा नरकतुल्य कष्ट न भोगना पड़े ॥ ३७ ॥ यदि त्वं हि पुरा राजन्निदं राज्यमवाप्तवान् । ध्रुवं प्राप्स्याम च वयं राज्यमप्यवशे जने ॥ ३८ ॥ राजन्! यदि पहले ही आपने यह राज्य पा लिया होता तो आज हम अवश्य ही इसे प्राप्त कर लेते; फिर तो लोगोंका कोई वश नहीं चलता ॥ ३८ ॥