भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1041

वे इतने भोले-भाले थे कि अपने स्नान-भोजन आदि अभीष्ट कर्तव्योंके सम्बन्धमें भी कुछ नहीं जानते थे। वे उत्तम व्रतका पालन करते हुए प्रतिदिन मुझसे यही कहते थे कि 'यह राज्य तो आपका ही है' ॥ ७ ॥ तस्य पुत्रो यथा पाण्डुस्तथा धर्मपरायणः । गुणवाँल्लोकविख्यातः पौरवाणां सुसम्मतः ॥ ८ ॥ उनके पुत्र युधिष्ठिर भी वैसे ही धर्मपरायण हैं, जैसे स्वयं पाण्डु थे। वे उत्तम गुणोंसे सम्पन्न, सम्पूर्ण जगत्में विख्यात तथा पूरुवंशियोंके अत्यन्त प्रिय हैं ॥ ८ ॥ स कथं शक्यतेऽस्माभिरपाकर्तुं बलादितः । पितृपैतामहाद् राज्यात् ससहायो विशेषतः ॥ ९ ॥ फिर उन्हें उनके बाप-दादोंके राज्यसे बलपूर्वक कैसे हटाया जा सकता है? विशेषतः ऐसे समयमें, जब कि उनके सहायक अधिक हैं ॥ ९ ॥ भृता हि पाण्डुनामात्या बलं च सततं भृतम् । भृताः पुत्राश्च पौत्राश्च तेषामपि विशेषतः ॥ १० ॥ पाण्डुने सभी मन्त्रियों तथा सैनिकोंका सदा पालन-पोषण किया था। उनका ही नहीं, उनके पुत्र-पौत्रोंके भी भरण-पोषणका विशेष ध्यान रखा था ॥ १० ॥ ते पुरा सत्कृतास्तात पाण्डुना नागरा जनाः । कथं युधिष्ठिरस्यार्थे न नो हन्युः सबान्धवान् ॥ ११ ॥ तात! पाण्डुने पहले नागरिकोंके साथ बड़ा ही सद्भावपूर्ण व्यवहार किया है। अब वे विद्रोही होकर युधिष्ठिरके हितके लिये भाई-बन्धुओंके साथ हम सब लोगोंकी हत्या क्यों न कर डालेंगे? ॥ ११ ॥

दुर्योधन उवाच

एवमेतन्मया तात भावितं दोषमात्मनि । दृष्ट्वा प्रकृतयः सर्वा अर्थमानेन पूजिताः ॥ १२ ॥ **दुर्योधन बोला—**पिताजी! मैंने भी अपने हृदयमें इस दोष (प्रजाके विरोधी होने)-की सम्भावना की थी और इसीपर दृष्टि रखकर पहले ही अर्थ और सम्मानके द्वारा समस्त प्रजाका आदर-सत्कार किया है ॥ १२ ॥ ध्रुवमस्मत्सहायास्ते भविष्यन्ति प्रधानतः । अर्थवर्गः सहामात्यो मत्संस्थोऽद्य महीपते ॥ १३ ॥ अब निश्चय ही वे लोग मुख्यतासे हमारे सहायक होंगे। राजन्! इस समय खजाना और मन्त्रिमण्डल हमारे ही अधीन हैं ॥ १३ ॥ स भवान् पाण्डवानाशु विवासयितुमर्हति । मृदुनैवाभ्युपायेन नगरं वारणावतम् ॥ १४ ॥