भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1070

**पुरवासी बोले—**अहो! पुरोचनका अन्तःकरण अपने वशमें नहीं था। उस पापीने दुर्योधनकी आज्ञासे अपने ही विनाशके लिये इस घरको बनवाया और जला भी दिया! अहो! धिक्कार है, धृतराष्ट्रकी बुद्धि बहुत बिगड़ गयी है, जिसने शुद्ध हृदयवाले पाण्डुपुत्रोंको शत्रुकी भाँति आगमें जला दिया ॥ १४-१५ ॥ दिष्ट्या त्विदानीं पापात्मा दग्धोऽयमतिदुर्मतिः । अनागसः सुविश्वस्तान् यो ददाह नरोत्तमान् ॥ १६ ॥ सौभाग्यकी बात है कि यह अत्यन्त खोटी बुद्धिवाला पापात्मा पुरोचन भी इस समय दग्ध हो गया है, जिसने बिना किसी अपराधके अपने ऊपर पूर्ण विश्वास करनेवाले नरश्रेष्ठ पाण्डवोंको जला दिया है ॥ १६ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं ते विलपन्ति स्म वारणावतका जनाः । परिवार्य गृहं तच्च तस्थू रात्रौ समन्ततः ॥ १७ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! इस प्रकार वारणावतके लोग विलाप करने लगे। वे रातभर उस घरको चारों ओरसे घेरकर खड़े रहे ॥ १७ ॥ पाण्डवाश्चापि ते सर्वे सह मात्रा सुदुःखिताः । बिलेन तेन निर्गत्य जग्मुर्द्रुतमलक्षिताः ॥ १८ ॥ उधर समस्त पाण्डव भी अत्यन्त दुःखी हो अपनी माताके साथ सुरंगके मार्गसे निकलकर तुरंत ही दूर चले गये। उन्हें कोई भी देख न सका ॥ १८ ॥ तेन निद्रोपरोधेन साध्वसेन च पाण्डवाः । न शेकुः सहसा गन्तुं सह मात्रा परंतपाः ॥ १९ ॥ नींद न ले सकनेके कारण आलस्य और भयसे युक्त परंतप पाण्डव अपनी माताके साथ जल्दी-जल्दी चल नहीं पाते थे ॥ १९ ॥ भीमसेनस्तु राजेन्द्र भीमवेगपराक्रमः । जगाम भ्रातृनादाय सर्वान् मातरमेव च ॥ २० ॥ स्कन्धमारोप्य जननीं यमावङ्केन वीर्यवान् । पार्थौ गृहीत्वा पाणिभ्यां भ्रातरौ सुमहाबलः ॥ २१ ॥ राजेन्द्र! भयंकर वेग और पराक्रमवाले भीमसेन अपने सब भाइयों तथा माताको भी साथ लिये चल रहे थे। वे महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न थे। उन्होंने माताको तो कंधेपर चढ़ा लिया और नकुल-सहदेवको गोदमें उठा लिया तथा शेष दोनों भाइयोंको दोनों हाथोंसे पकड़कर उन्हें सहारा देते हुए चलने लगे ॥ २०-२१ ॥ उरसा पादपान् भञ्जन् महीं पद्भ्यां विदारयन् । स जगामाशु तेजस्वी वातरंहा वृकोदरः ॥ २२ ॥