महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1087, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ें‘मैं पाँच पाण्डुपुत्रोंकी माता हूँ और उन्हींके बीचमें स्थित हूँ, तो भी प्याससे व्याकुल हूँ’ इस प्रकार कुन्तीदेवीने अपने बेटोंके समक्ष यह बात बार-बार दुहरायी ॥ १३ ॥ तच्छ्रुत्वा भीमसेनस्य मातृस्नेहात् प्रजल्पितम् । कारुण्येन मनस्तप्तं गमनायोपचक्रमे ॥ १४ ॥ माताका वात्सल्यसे कहा हुआ वह वचन सुनकर भीमसेनका हृदय करुणासे भर आया। वे मन-ही-मन संतप्त हो उठे और स्वयं ही (पानी लानेके लिये) जानेकी तैयारी करने लगे ॥ १४ ॥ ततो भीमो वनं घोरं प्रविश्य विजनं महत् । न्यग्रोधं विपुलच्छायं रमणीयं ददर्श ह ॥ १५ ॥ उस समय भीमने उस विशाल, निर्जन एवं भयंकर वनमें प्रवेश करके एक बहुत सुन्दर और विस्तृत छायावाला बरगदका पेड़ देखा ॥ १५ ॥ तत्र निक्षिप्य तान् सर्वानुवाच भरतर्षभः । पानीयं मृगयामीह विश्रमध्वमिति प्रभो ॥ १६ ॥ राजन्! भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ भीमसेनने उन सबको वहीं बिठाकर कहा—‘आपलोग यहाँ विश्राम करें, तबतक मैं पानीका पता लगाता हूँ’ ॥ १६ ॥ एते रुवन्ति मधुरं सारसा जलचारिणः । ध्रुवमत्र जलस्थानं महच्च्येति मतिर्मम ॥ १७ ॥ ‘ये जलचर सारस पक्षी बड़ी मीठी बोली बोल रहे हैं; (अतः) यहाँ (पासमें) अवश्य कोई महान् जलाशय होगा—ऐसा मेरा विश्वास है’ ॥ १७ ॥ अनुज्ञातः स गच्छेति भ्रात्रा ज्येष्ठेन भारत । जगाम तत्र यत्र स्म सारसा जलचारिणः ॥ १८ ॥ भारत! तब बड़े भाई युधिष्ठिरने ‘जाओ!’ कहकर उन्हें अनुमति दे दी। आज्ञा पाकर भीमसेन वहीं गये, जहाँ ये जलचर सारस पक्षी कलरव कर रहे थे ॥ १८ ॥ स तत्र पीत्वा पानीयं स्नात्वा च भरतर्षभ । तेषामर्थे च जग्राह भ्रातॄणां भ्रातृवत्सलः । उत्तरीयेण पानीयमानयामास भारत ॥ १९ ॥ भरतश्रेष्ठ! वहाँ पानी पीकर स्नान कर लेनेके पश्चात् भाइयॉंपर स्नेह रखनेवाले भीम उनके लिये भी चादरमें पानी ले आये ॥ १९ ॥ गव्यूतिमात्रादागत्य त्वरितो मातरं प्रति । शोकदुःखपरीतात्मा निःश्वश्वासोरगो यथा ॥ २० ॥ दो कोस दूरसे जल्दी-जल्दी चलकर भीमसेन अपनी माताके पास आये। उनका मन शोक और दुःखसे व्याप्त था और वे सर्पकी भाँति लंबी सांस खींच रहे थे ॥ २० ॥ स सुप्तां मातरं दृष्ट्वा भ्रातॄंश्च वसुधातले ।