भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1089

‘जो नित्य धर्मपरायण नरेश तीनों लोकोंका राज्य पानेके अधिकारी हैं, वे ही आज साधारण मनुष्योंकी भाँति थके-माँदे पृथ्वीपर कैसे पड़े हैं ।। २९ ।।

अयं नीलाम्बुदश्यामो नरेष्वप्रतिमोऽर्जुनः । शेते प्राकृतवद् भूमौ ततो दुःखतरं नु किम् ।। ३० ।।

‘मनुष्योंमें जिनकी कहीं समता नहीं है, वे नील मेघके समान श्याम कान्तिवाले अर्जुन आज प्राकृत जनोंकी भाँति पृथ्वीपर सो रहे हैं; इससे महान् दुःख और क्या हो सकता है ।। ३० ।।

अश्विनाविव देवानां याविमौ रूपसम्पदा । तौ प्राकृतवदद्येमौ प्रसुप्तौ धरणीतले ।। ३१ ।।

‘जो अपनी रूप-सम्पत्तिसे देवताओंमें अश्विनीकुमारोंके समान जान पड़ते हैं, वे ही ये दोनों नकुल-सहदेव आज यहाँ साधारण मनुष्योंके समान जमीनपर सोये पड़े हैं ।। ३१ ।।

ज्ञातयो यस्य नैव स्युर्विषमाः कुलपांसनाः । स जीवेत् सुखं लोके ग्रामद्रुम इवैकजः ।। ३२ ।।

‘जिसके कुटुम्बी पक्षपातयुक्त और कुलको कलंक लगानेवाले नहीं होते, वह पुरुष गाँवके अकेले वृक्षकी भाँति संसारमें सुखपूर्वक जीवन धारण करता है ।। ३२ ।।

एको वृक्षो हि यो ग्रामे भवेत् पर्णफलान्वितः । चैत्यो भवति निर्ज्ञातिरर्चनीयः सुपूजितः ।। ३३ ।।

‘गाँवमें यदि एक ही वृक्ष पत्र और फल-फूलोंसे सम्पन्न हो तो वह दूसरे सजातीय वृक्षोंसे रहित होनेपर भी चैत्य (देववृक्ष) माना जाता है तथा उसे पूज्य मानकर उसकी खूब पूजा की जाती है ।। ३३ ।।

येषां च बहवः शूरा ज्ञातयो धर्ममाश्रिताः । ते जीवन्ति सुखं लोके भवन्ति च निरामयाः ।। ३४ ।।

‘जिनके बहुत-से शूरवीर भाई-बन्धु धर्म-परायण होते हैं, वे भी संसारमें नीरोग रहते और सुखसे जीते हैं ।। ३४ ।।

बलवन्तः समृद्धार्था मित्रबान्धवनन्दनाः । जीवन्त्यन्योन्यमाश्रित्य द्रुमाः काननजा इव ।। ३५ ।।

‘जो बलवान्, धनसम्पन्न तथा मित्रों और भाई-बन्धुओंको आनन्दित करनेवाले हैं, वे जंगलके वृक्षोंकी भाँति एक-दूसरेके सहारे जीवन धारण करते हैं ।। ३५ ।।

वयं तु धृतराष्ट्रेण सपुत्रेण दुरात्मना । विवासिता न दग्धाश्च कथंचिद् दैवसंश्रयात् ।। ३६ ।।

‘दुरात्मा धृतराष्ट्र और उसके पुत्रोंने तो हमें घरसे निकाल दिया और जलानेकी भी चेष्टा की, परंतु किसी तरह भाग्यके भरोसे हम बच गये हैं ।। ३६ ।।

तस्मान्मुक्ता वयं दाहादिमं वृक्षमुपाश्रिताः ।