महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1093, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंलिया ।। ५ ।।
ऊर्ध्वाङ्गुलिः स कण्डूयन् धुन्वन् रूक्षान् शिरोरुहान् । जृम्भमाणो महावक्त्रः पुनः पुनरवेक्ष्य च ।। ६ ।। तब अंगुलियोंको ऊपर उठाकर सिरके रूखे बालोंको खुजलाता और फटकारता हुआ वह विशाल मुखवाला राक्षस पाण्डवोंकी ओर बार-बार देखकर जँभाई लेने लगा ।। ६ ।। हृष्टो मानुषमांसस्य महाकायो महाबलः । आघ्राय मानुषं गन्धं भगिनीमिदमब्रवीत् ।। ७ ।। मनुष्यका मांस मिलनेकी सम्भावनासे उसे बड़ा हर्ष हुआ। उस महाबली विशालकाय राक्षसने मनुष्यकी गन्ध पाकर अपनी बहिनसे इस प्रकार कहा— ।। ७ ।। उपपन्नश्चिरस्याद्य भक्षोऽयं मम सुप्रियः । स्नेहस्रवान् प्रस्रवति जिह्वा पर्येति मे सुखम् ।। ८ ।। ‘आज बहुत दिनोंके बाद ऐसा भोजन मिला है, जो मुझे बहुत प्रिय है। इस समय मेरी जीभ लार टपका रही है और बड़े सुखसे लप-लप कर रही है ।। ८ ।। अष्टौ दंष्ट्राः सुतीक्ष्णाग्राश्चिरस्यापातदुस्सहाः । देहेषु मज्जयिष्यामि स्निग्धेषु पिशितेषु च ।। ९ ।।