महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1096, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंवसति ह्यत्र पापात्मा हिडिम्बो नाम राक्षसः ॥ २५ ॥ 'इन्हें यह पता नहीं है कि यह गहन वन राक्षसोंका निवासस्थान है। यहाँ हिडिम्ब नामक पापात्मा राक्षस रहता है ॥ २५ ॥ तेनाहं प्रेषिता भ्रात्रा दुष्टभावेन रक्षसा । बिभक्षयिषता मांसं युष्माकममरोपम ॥ २६ ॥ 'वह मेरा भाई है। उस राक्षसने दुष्टभावसे मुझे यहाँ भेजा है। देवोपम वीर! वह आपलोगोंका मांस खाना चाहता है ॥ २६ ॥ साहं त्वामभिसम्प्रेक्ष्य देवगर्भसमप्रभम् । नान्यं भर्तारमिच्छामि सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ २७ ॥ 'आपका तेज देवकुमारोंका-सा है, मैं आपको देखकर अब दूसरेको अपना पति बनाना नहीं चाहती। मैं यह सच्ची बात आपसे कह रही हूँ ॥ २७ ॥ एतद् विज्ञाय धर्मज्ञ युक्तं मयि समाचर । कामोपहतचित्ताङ्गीं भजमानां भजस्व माम् ॥ २८ ॥ 'धर्मज्ञ! इस बातको समझकर आप मेरे प्रति उचित बर्ताव कीजिये। मेरे तन-मनको कामदेवने मथ डाला है। मैं आपकी सेविका हूँ, आप मुझे स्वीकार कीजिये ॥ २८ ॥ त्रास्यामि त्वां महाबाहो राक्षसात् पुरुषादकात् । वत्स्यावो गिरिदुर्गेषु भर्ता भव ममानघ ॥ २९ ॥ 'महाबाहो! मैं इस नरभक्षी राक्षससे आपकी रक्षा करूँगी। हम दोनों पर्वतोंकी दुर्गम कन्दराओंमें निवास करेंगे। अनघ! आप मेरे पति हो जाइये ॥ २९ ॥ (इच्छामि वीर भद्रं ते मा मा प्राणा विहासिषुः । त्वया ह्यहं परित्यक्ता न जीवेयमरिंदम ॥) अन्तरिक्षचरी ह्यस्मि कामतो विचरामि च । अतुलामाप्नुहि प्रीतिं तत्र तत्र मया सह ॥ ३० ॥ 'वीर! आपका भला चाहती हूँ। कहीं ऐसा न हो कि आपके ठुकरानेसे मेरे प्राण ही मुझे छोड़कर चले जायँ। शत्रुदमन! यदि आपने मुझे त्याग दिया तो मैं कदापि जीवित नहीं रह सकती। मैं आकाशमें विचरनेवाली हूँ। जहाँ इच्छा हो, वहीं विचरण कर सकती हूँ। आप मेरे साथ भिन्न-भिन्न लोकों और प्रदेशोंमें विहार करके अनुपम प्रसन्नता प्राप्त कीजिये' ॥ ३० ॥
भीमसेन उवाच
(एष ज्येष्ठो मम भ्राता मान्यः परमको गुरुः । अनिविष्टश्च तन्माहं परिविद्यां कथंचन ॥) मातरं भ्रातरं ज्येष्ठं सुखसुप्तान् कथं त्विमान् ।