महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतत्पश्चात् काले मेघके समान उस राक्षसके शरीरको भीमने क्रोधपूर्वक तुरंत ऊपर उठा लिया और उसे सौ बार घुमाया ॥ २५ ॥
भीम उवाच वृथामांसैर्वृथापुष्टो वृथावृद्धो वृथामतिः । वृथामरणमर्हस्त्वं वृथाद्य न भविष्यसि ॥ २६ ॥ इसके बाद भीम उस राक्षससे बोले—अरे निशाचर! तू व्यर्थ मांससे व्यर्थ ही पुष्ट होकर व्यर्थ ही बड़ा हुआ है। तेरी बुद्धि भी व्यर्थ है। इसीसे तू व्यर्थ मृत्युके योग्य है। इसलिये आज तू व्यर्थ ही अपनी इहलीला समाप्त करेगा (बाहुयुद्धमें मृत्यु होनेके कारण तू स्वर्ग और कीर्तिसे वंचित हो जायगा) ॥ २६ ॥ क्षेममद्य करिष्यामि यथा वनमकण्टकम् । न पुनर्मानुषान् हत्वा भक्षयिष्यसि राक्षस ॥ २७ ॥ राक्षस! आज तुझे मारकर मैं इस वनको निष्कण्टक एवं मंगलमय बना दूँगा, जिससे फिर तू मनुष्योंको मारकर नहीं खा सकेगा ॥ २७ ॥
अर्जुन उवाच यदि वा मन्यसे भारं त्वमिमं राक्षसं युधि । करोमि तव साहाय्यं शीघ्रमेष निपात्यताम् ॥ २८ ॥ अर्जुन बोले—भैया! यदि तुम युद्धमें इस राक्षसको अपने लिये भार समझ रहे हो तो मैं तुम्हारी सहायता करता हूँ। तुम इसे शीघ्र मार गिराओ ॥ २८ ॥ अथवाप्यहमेवैनं हनिष्यामि वृकोदर । कृतकर्मा परिश्रान्तः साधु तावदुपारम ॥ २९ ॥ वृकोदर! अथवा मैं ही इसे मार डालूँगा। तुम अधिक युद्ध करके थक गये हो। अतः कुछ देर अच्छी तरह विश्राम कर लो ॥ २९ ॥
वैशम्पायन उवाच तस्य तद् वचनं श्रुत्वा भीमसेनोऽत्यमर्षणः । निष्पिष्यैनं बलाद् भूमौ पशुमारममारयत् ॥ ३० ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! अर्जुनकी यह बात सुनकर भीमसेन अत्यन्त क्रोधमें भर गये। उन्होंने बलपूर्वक राक्षसको पृथ्वीपर दे मारा और उसे रगड़ते हुए पशुकी तरह मारना आरम्भ किया ॥ ३० ॥ स मार्यमाणो भीमेन ननाद विपुलं स्वनम् । पूरयंस्तद् वनं सर्वं जलार्द्र इव दुन्दुभिः ॥ ३१ ॥