भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 117

संशप्तकावशेषं च कृतं निःशेषमाहवे । संशप्तकानां वीराणां कोट्यो नव महात्मनाम् ॥ २६१ ॥ किरीटिनाभिनिष्क्रम्य प्रापिता यमसादनम् । धृतराष्ट्रस्य पुत्राश्च तथा पाषाणयोधिनः ॥ २६२ ॥ नारायणाश्च गोपालाः समरे चित्रयोधिनः । अलम्बुषः श्रुतायुश्च जलसन्धश्च वीर्यवान् ॥ २६३ ॥ सौमदत्तिर्विराटश्च द्रुपदश्च महारथः । घटोत्कचादयश्चान्ये निहता द्रोणपर्वणि ॥ २६४ ॥ अर्जुनने संशप्तकोंमेंसे जो बच रहे थे, उन्हें भी युद्धभूमिमें निःशेष कर दिया। महामना संशप्तक वीरोंकी संख्या नौ करोड़ थी; परंतु किरीटधारी अर्जुनने आक्रमण करके अकेले ही उन सबको यमलोक भेज दिया। धृतराष्ट्रपुत्र, बड़े-बड़े पाषाणखण्ड लेकर युद्ध करनेवाले म्लेच्छ-सैनिक, समरांगणमें युद्धके विचित्र कला-कौशलका परिचय देनेवाले नारायण नामक गोप, अलम्बुष, श्रुतायु, पराक्रमी जलसन्ध, भूरिश्रवा, विराट, महारथी द्रुपद तथा घटोत्कच आदि जो बड़े-बड़े वीर मारे गये हैं, वह प्रसंग भी इसी पर्वमें है ।। २६१—२६४ ।।

अश्वत्थामापि चात्रैव द्रोणे युधि निपातिते । अस्त्रं प्रादुश्चकारोग्रं नारायणममर्षितः ॥ २६५ ॥ इसी पर्वमें यह बात भी आयी है कि युद्धमें जब पिता द्रोणाचार्य मार गिराये गये, तब अश्वत्थामाने भी शत्रुओंके प्रति अमर्षमें भरकर 'नारायण' नामक भयानक अस्त्रको प्रकट किया था ।। २६५ ।।

आग्नेयं कीर्त्यते यत्र रुद्रमाहात्म्यमुत्तमम् । व्यासस्य चाप्यागमनं माहात्म्यं कृष्णपार्थयोः ॥ २६६ ॥ इसीमें आग्नेयास्त्र तथा भगवान् रुद्रके उत्तम माहात्म्यका वर्णन किया गया है। व्यासजीके आगमन तथा श्रीकृष्ण और अर्जुनके माहात्म्यकी कथा भी इसीमें है ।। २६६ ।।

सप्तमं भारते पर्व महदेतदुदाहृतम् । यत्र ते पृथिवीपालाः प्रायशो निधनं गताः ॥ २६७ ॥ द्रोणपर्वणि ये शूरा निर्दिष्टाः पुरुषर्षभाः । अत्राध्यायशतं प्रोक्तं तथाध्यायाश्च सप्ततिः ॥ २६८ ॥ अष्टौ श्लोकसहस्राणि तथा नव शतानि च । श्लोका नव तथैवात्र संख्यातास्तत्त्वदर्शिना ॥ २६९ ॥ पाराशर्येण मुनिना संचिन्त्य द्रोणपर्वणि ।

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