भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1175

ततो द्रुपदमासाद्य भारद्वाजः प्रतापवान् । अब्रवीत् पुरुषव्याघ्रः सखायं विद्धि मामिति ॥ १४ ॥ तब पुरुषसिंह प्रतापी द्रोणने राजा द्रुपदके पास जाकर कहा—'राजन्! मैं तुम्हारा सखा हूँ, मुझे पहचानो' ॥ १४ ॥

द्रुपद उवाच

नाश्रोत्रियः श्रोत्रियस्य नार्थी रथिनः सखा । नाराजा पार्थिवस्यापि सखिपूर्वं किमिष्यते ॥ १५ ॥ द्रुपदने कहा—जो श्रोत्रिय नहीं है, वह श्रोत्रियका; जो रथी नहीं है, वह रथी वीरका और इसी प्रकार जो राजा नहीं है, वह किसी राजाका मित्र होनेयोग्य नहीं है; फिर तुम पहलेकी मित्रताकी अभिलाषा क्यों करते हो? ॥ १५ ॥

ब्राह्मण उवाच

स विनिश्चित्य मनसा पाञ्चाल्यं प्रति बुद्धिमान् । जगाम कुरुमुख्यानां नगरं नागसाह्वयम् ॥ १६ ॥ आगन्तुक ब्राह्मणने कहा—बुद्धिमान् द्रोणने पांचालराज द्रुपदसे बदला लेनेका मन-ही-मन निश्चय किया। फिर वे कुरुवंशी राजाओंकी राजधानी हस्तिनापुरमें गये ॥ १६ ॥ तस्मै पौत्रान् समादाय वसूनि विविधानि च । प्राप्ताय प्रददौ भीष्मः शिष्यान् द्रोणाय धीमते ॥ १७ ॥ वहाँ जानेपर बुद्धिमान् द्रोणको नाना प्रकारके धन लेकर भीष्मजीने अपने सभी पौत्रोंको उन्हें शिष्यरूपमें सौंप दिया ॥ १७ ॥ द्रोणः शिष्यांस्ततः पार्थानिदं वचनमब्रवीत् । समानीय तु ताञ्शिष्यान् द्रुपदस्यासुखाय वै ॥ १८ ॥ तब द्रोणने सब शिष्योंको एकत्र करके, जिनमें कुन्तीके पुत्र तथा अन्य लोग भी थे, द्रुपदको कष्ट देनेके उद्देश्यसे इस प्रकार कहा— ॥ १८ ॥ आचार्यवेतनं किंचिद् हृदि यद् वर्तते मम । कृतास्त्रैस्तत् प्रदेयं स्यात् तद्द्रुतं वदतानघाः । सोऽर्जुनप्रमुखैरुक्तस्तथास्त्विति गुरुस्तदा ॥ १९ ॥ 'निष्पाप शिष्यगण! मेरे मनमें तुमलोगोंसे कुछ गुरुदक्षिणा लेनेकी इच्छा है। अस्त्रविद्यामें पारंगत होनेपर तुम्हें वह दक्षिणा देनी होगी। इसके लिये सच्ची प्रतिज्ञा करो।' तब अर्जुन आदि शिष्योंने अपने गुरुसे कहा—'तथास्तु (ऐसा ही होगा)' ॥ १९ ॥ यदा च पाण्डवाः सर्वे कृतास्त्राः कृतनिश्चयाः । ततो द्रोणोऽब्रवीद् भूयो वेतनार्थमिदं वचः ॥ २० ॥