महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'यह बहुत बड़ा कार्य है' ऐसा विचार करके याजने इस कार्यके लिये किसी प्रकारकी कामना न रखनेवाले उपयाजको भी प्रेरित किया तथा याजने द्रोणके विनाशके लिये वैसा पुत्र उत्पन्न करनेकी प्रतिज्ञा कर ली। इसके बाद महातपस्वी उपयाजने राजा द्रुपदको अभीष्ट पुत्ररूपी फलकी सिद्धिके लिये आवश्यक यज्ञकर्मका उपदेश किया ॥ ३२—३३ ॥
स च पुत्रो महावीर्यो महातेजा महाबलः ।
इष्यते यदिधो राजन् भविता ते तथाविधः ॥ ३४ ॥
और कहा—'राजन्! इस यज्ञसे तुम जैसा पुत्र चाहते हो, वैसा ही तुम्हें होगा। तुम्हारा वह पुत्र महान् पराक्रमी, महातेजस्वी और महाबली होगा' ॥ ३४ ॥
भारद्वाजस्य हन्तारं सोऽभिसंधाय भूपतिः ।
आजह्रे तत् तथा सर्वं द्रुपदः कर्मसिद्धये ॥ ३५ ॥
तदनन्तर द्रोणके घातक पुत्रका संकल्प लेकर राजा द्रुपदने कर्मकी सिद्धिके लिये उपयाजके कथनानुसार सारी व्यवस्था की ॥ ३५ ॥
याजस्तु हवनस्यान्ते देवीमाज्ञापयत् तदा ।
प्रेहि मां राज्ञि पृषति मिथुनं त्वामुपस्थितम् ॥ ३६ ॥
(कुमारश्च कुमारी च पितृवंशविवृद्धये ।)
हवनके अन्तमें याजने द्रुपदकी रानीको आज्ञा दी—'पृषतकी पुत्रवधू! महारानी! शीघ्र मेरे पास हविष्य ग्रहण करनेके लिये आओ। तुम्हें एक पुत्र और एक कन्याकी प्राप्ति होनेवाली है, वे कुमार और कुमारी अपने पिताके कुलकी वृद्धि करनेवाले होंगे' ॥ ३६ ॥
राज्ञ्युवाच
अवलिप्तं मुखं ब्रह्मन् दिव्यान् गन्धान् बिभर्मि च ।
सुतार्थे नोपलब्धास्मि तिष्ठ याज मम प्रिये ॥ ३७ ॥
रानी बोली— ब्रह्मन्! अभी मेरे मुखमें ताम्बूल आदिका रंग लगा है! मैं अपने अंगोंमें दिव्य सुगन्धित अंगराग धारण कर रही हूँ, अतः मुँह धोये और स्नान किये बिना पुत्रदायक हविष्यका स्पर्श करनेके योग्य नहीं हूँ, इसलिये याजजी! मेरे इस प्रिय कार्यके लिये थोड़ी देर ठहर जाइये ॥ ३७ ॥
याज उवाच
याजेन श्रपितं हव्यमुपयाजाभिमन्त्रितम् ।
कथं कामं न संदध्यात् सा त्वं विप्रैहि तिष्ठ वा ॥ ३८ ॥
याजने कहा— इस हविष्यको स्वयं याजने पकाकर तैयार किया है और उपयाजने इसे अभिमन्त्रित किया है; अतः तुम आओ या वहीं खड़ी रहो, यह हविष्य यजमानकी कामनाको पूर्ण कैसे नहीं करेगा? ॥ ३८ ॥
ब्राह्मण उवाच