महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 119, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंतदनन्तर द्वन्द्वयुद्धमें अर्जुनने महारथी कर्णको जो मार गिराया, वह प्रसंग भी कर्णपर्वमें ही है। महाभारतका विचार करनेवाले विद्वानोंने इस कर्णपर्वको आठवाँ पर्व कहा है ॥ २७७ ॥
एकोनसप्ततिः प्रोक्ता अध्यायाः कर्णपर्वणि ।
चत्वार्यैव सहस्राणि नव श्लोकशतानि च ॥ २७८ ॥
चतुःषष्टिस्तथा श्लोकाः पर्वण्यस्मिन् प्रकीर्तिताः ।
कर्णपर्वमें उनहत्तर (६९) अध्याय कहे गये हैं और चार हजार नौ सौ चौंसठ (४,९६४) श्लोकोंका पाठ इस पर्वमें किया गया है ॥ २७८ ½ ॥
अतः परं विचित्रार्थं शल्यपर्व प्रकीर्तितम् ॥ २७९ ॥
तत्पश्चात् विचित्र अर्थयुक्त विषयोंसे भरा हुआ शल्यपर्व कहा गया है ॥ २७९ ॥
हतप्रवीरे सैन्ये तु नेता मद्रेश्वरोऽभवत् ।
यत्र कौमारमाख्यानमभिषेकस्य कर्म च ॥ २८० ॥
इसीमें यह कथा आयी है कि जब कौरवसेनाके सभी प्रमुख वीर मार दिये गये, तब मद्रराज शल्य सेनापति हुए। वहीं कुमार कार्तिकेयका उपाख्यान और अभिषेककर्म कहा गया है ॥ २८० ॥
वृत्तानि रथयुद्धानि कीर्त्यन्ते यत्र भागशः ।
विनाशः कुरुमुख्यानां शल्यपर्वणि कीर्त्यते ॥ २८१ ॥
शल्यस्य निधनं चात्र धर्मराजान्महात्मनः ।
शकुनेश्च वधोऽत्रैव सहदेवेन संयुगे ॥ २८२ ॥
साथ ही वहाँ रथियोंके युद्धका भी विभागपूर्वक वर्णन किया गया है। शल्यपर्वमें ही कुरुकुलके प्रमुख वीरोंके विनाशका तथा महात्मा धर्मराजद्वारा शल्यके वधका वर्णन किया गया है। इसीमें सहदेवके द्वारा युद्धमें शकुनिके मारे जानेका प्रसंग है ॥ २८१-२८२ ॥
सैन्ये च हतभूयिष्ठे किंचिच्छिष्टे सुयोधनः ।
ह्रदं प्रविश्य यत्रासौ संस्तभ्यापो व्यवस्थितः ॥ २८३ ॥
जब अधिक-से-अधिक कौरवसेना नष्ट हो गयी और थोड़ी-सी बच रही, तब दुर्योधन सरोवरमें प्रवेश करके पानीको स्तम्भित कर वहीं विश्रामके लिये बैठ गया ॥ २८३ ॥
प्रवृत्तिस्तत्र चाख्याता यत्र भीमस्य लुब्धकैः ।
क्षेपयुक्तैर्वचोभिश्च धर्मराजस्य धीमतः ॥ २८४ ॥
ह्रदात् समुत्थितो यत्र धार्तराष्ट्रोऽत्यमर्षणः ।
भीमेन गदया युद्धं यत्रासी कृतवान् सह ॥ २८५ ॥
किंतु व्याधोंने भीमसेनसे दुर्योधनकी यह चेष्टा बतला दी। तब बुद्धिमान् धर्मराजके आक्षेपयुक्त वचनोंसे अत्यन्त अमर्षमें भरकर धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन सरोवरसे बाहर निकला और उसने भीमसेनके साथ गदायुद्ध किया। ये सब प्रसंग शल्यपर्वमें ही हैं ॥ २८४-२८५ ॥